मैं उन्हें वंदन करता हूँ जो परम आनंद हैं, जिनकी लीलाएँ अनंत हैं; जो महेश्वर हैं, सर्वव्यापक और महान् हैं; गौरी के प्रिय, कार्तिकेय और विघ्नराज गणेश के जनक — आदिदेव शंकर।
यह शतरुद्र संहिता का मंगलाचरण है — वह संहिता जो शिव के अनेक अवतारों की कथा कहती है। “जिनकी लीलाएँ अनंत हैं” उसका उपयुक्त द्वार है।
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मूल पाठ
वन्दे महानन्दमनन्तलीलं
महेश्वरं सर्वविभुं महान्तम् ।
गौरीप्रियं कार्तिकविघ्नराज-
समुद्भवं शङ्करमादिदेवम् ॥
vande mahānandam ananta-līlaṃ
maheśvaraṃ sarva-vibhuṃ mahāntam |
gaurī-priyaṃ kārtika-vighnarāja-
samudbhavaṃ śaṅkaram ādi-devam ||
अनुवाद
मैं उन्हें वंदन करता हूँ जो परम आनंद हैं, जिनकी लीलाएँ अनंत हैं; जो महेश्वर हैं, सर्वव्यापक और महान् हैं; गौरी के प्रिय, कार्तिकेय और विघ्नराज गणेश के जनक — आदिदेव शंकर।
अनुवादक: ॐ नमः शिवाय टीम
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पूरी व्याख्या पढ़ें →शिव का केंद्रीय पुराण, सात संहिताओं में: विद्येश्वर, रुद्र (पाँच खंडों में), शतरुद्र, कोटिरुद्र, उमा, कैलास और वायवीय। अध्याय-संख्या संस्करणों में बदलती है; हमारे सभी संदर्भ गीताप्रेस के कल्याण शिवमहापुराणाङ्क के अनुसार हैं।
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