रूपरूप

शिव के रूप

नर्तक, गुरु, तपस्वी, संहारक, अर्धनारी, नीलकंठ। हर रूप एक उपदेश है — यहाँ देखिए हर रूप में क्या है, और वह कहाँ वर्णित है।

नटराज

नर्तकों के राजा

Naṭarāja

अग्नि-वृत्त के भीतर नृत्य करते शिव, जो सृष्टि को रचते और फिर समेट लेते हैं। एक ही प्रतिमा में उनके पाँचों ब्रह्मांडीय कर्म।

प्रतिमा-लक्षण और स्रोत
  • ऊपरी दाहिने हाथ में डमरू — पहली ध्वनि, सृष्टि।
  • ऊपरी बाएँ हाथ में अग्नि — संहार।
  • निचला दाहिना हाथ उठा हुआ, हथेली सामने (अभय मुद्रा) — “डरो मत”, रक्षा।
  • निचला बायाँ हाथ शरीर के आर-पार, उठे हुए पैर की ओर संकेत करता — मुक्ति का मार्ग।
  • दाहिना पैर बौने अपस्मार को दबाए — नियंत्रित अज्ञान।
  • ज्वालाओं का वृत्त (प्रभामंडल) — स्वयं ब्रह्मांड, जो निरंतर जलता और नया होता है।
मंदिर परंपरा
चिदंबरम् (तिल्लै) — कनक सभा
परंपरा से
तेवारम् (तमिल शैव स्तोत्र)
तिल्लै के नर्तक के स्तोत्र
विशिष्ट पदिगम् की सूची बनानी है।
शोध जारी
अर्धनारीश्वर

आधे नारी रूप वाले ईश्वर

Ardhanārīśvara

शिव और पार्वती एक ही शरीर में, बीच से विभाजित। चेतना और शक्ति, जो कभी सचमुच अलग नहीं।

प्रतिमा-लक्षण और स्रोत
  • दाहिना आधा भाग शिव: जटाएँ, अर्धचंद्र, सर्प, त्रिशूल।
  • बायाँ आधा भाग पार्वती: रत्नजड़ित मुकुट, स्त्री-वक्ष, हाथ में दर्पण या कमल।
  • एक ही शरीर, प्रायः कोमल त्रिभंग में खड़ा — दो का पूर्ण संतुलन।
शिव पुराण
शतरुद्र संहिता, अध्याय 3 (अर्धनारीश्वर अवतार)
क्रमांकन: गीताप्रेस, गोरखपुर — कल्याण श्रीशिवमहापुराणाङ्क (श्लोकाङ्क सहित हिन्दी अनुवाद)
अध्याय निश्चित
नीलकण्ठ

नीले कंठ वाले

Nīlakaṇṭha

वे शिव जिन्होंने संसार को जलाने वाला विष पिया और उसे कंठ में रोक लिया। वह करुणा जो पीड़ा अपने ऊपर ले लेती है।

प्रतिमा-लक्षण और स्रोत
  • गहरे नीले रंग का कंठ।
  • प्रायः प्याले से पीते या हथेली में विष लिए दिखाए जाते हैं।
शिव पुराण
शतरुद्र संहिता, अध्याय 15, श्लोक 16
क्रमांकन: गीताप्रेस, गोरखपुर — कल्याण श्रीशिवमहापुराणाङ्क (श्लोकाङ्क सहित हिन्दी अनुवाद)
श्लोक निश्चित
भागवत पुराण
स्कंध 8, अध्याय 7
अध्याय निश्चित
दक्षिणामूर्ति

दक्षिण की ओर मुख किए हुए

Dakṣiṇāmūrti

परम गुरु के रूप में शिव: वटवृक्ष के नीचे बैठे युवा गुरु, जो वृद्ध ऋषियों को मौन से सिखाते हैं। मौन ही उपदेश है।

प्रतिमा-लक्षण और स्रोत
  • वटवृक्ष के नीचे, दक्षिण की ओर मुख करके बैठे।
  • दाहिना हाथ चिन्मुद्रा में — अँगूठा और तर्जनी मिले हुए: जीवात्मा का परमात्मा से मिलन।
  • चरणों में बैठे चार ऋषि (सनक, सनंदन, सनातन, सनत्कुमार)।
दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम्
संपूर्ण स्तोत्र
परंपरा से आदि शंकराचार्य की रचना।
परंपरा से
भैरव

भयंकर

Bhairava

शिव का उग्र रूप, अहंकार को झुकाने के लिए प्रकट। काशी के रक्षक, जिनके आगे काल भी सिर झुकाता है।

प्रतिमा-लक्षण और स्रोत
  • उग्र मुख, विस्फारित नेत्र, प्रायः दंष्ट्राएँ।
  • हाथ में कपाल और त्रिशूल; साथ में श्वान।
  • वाराणसी के कोतवाल काल भैरव के रूप में पूजे जाते हैं।
शिव पुराण
शतरुद्र संहिता, अध्याय 8–9 (भैरव अवतार)
क्रमांकन: गीताप्रेस, गोरखपुर — कल्याण श्रीशिवमहापुराणाङ्क (श्लोकाङ्क सहित हिन्दी अनुवाद)
अध्याय निश्चित
लिङ्गोद्भव

लिंग से प्रकट होने वाले

Liṅgodbhava

उस अनंत अग्नि-स्तंभ से प्रकट होते शिव, जिसे न ब्रह्मा नाप सके, न विष्णु।

प्रतिमा-लक्षण और स्रोत
  • ऊँचे लिंग के बीच खुले भाग में शिव की आकृति।
  • नीचे वराह (विष्णु), ऊपर हंस (ब्रह्मा)।
  • दक्षिण भारतीय मंदिरों में गर्भगृह की पिछली (पश्चिमी) दीवार के आले में स्थापित।
शिव पुराण
विद्येश्वर संहिता, अध्याय 5–9; रुद्र संहिता, सृष्टि खंड, अध्याय 7
क्रमांकन: गीताप्रेस, गोरखपुर — कल्याण श्रीशिवमहापुराणाङ्क (श्लोकाङ्क सहित हिन्दी अनुवाद)
अध्याय निश्चित
लिंग पुराण
पूर्व भाग, अध्याय 17
अध्याय निश्चित
गङ्गाधर

गंगा को धारण करने वाले

Gaṅgādhara

वे शिव जिन्होंने स्वर्ग से गिरती नदी को अपनी जटाओं में थाम लिया, ताकि धरती न टूटे।

प्रतिमा-लक्षण और स्रोत
  • जटाओं में गंगा की छोटी-सी आकृति।
  • नदी को ग्रहण करने के लिए बाहर उठी एक जटा।
वाल्मीकि रामायण
बाल कांड — भगीरथ के सर्ग
सर्ग-संख्या संस्करण के अनुसार भिन्न।
अध्याय निश्चित
त्रिपुरान्तक

तीन नगरों के संहारक

Tripurāntaka

वह धनुर्धर जिसने तीन उड़ते नगरों को एक ही बाण से, उनके एक सीध में आने के उसी क्षण जला दिया।

प्रतिमा-लक्षण और स्रोत
  • विशाल धनुष (पिनाक) और बाण लिए खड़े।
  • कभी-कभी ब्रह्मांडीय रथ पर, ब्रह्मा सारथी।
शिव पुराण
रुद्र संहिता, युद्ध खंड, अध्याय 1–12
क्रमांकन: गीताप्रेस, गोरखपुर — कल्याण श्रीशिवमहापुराणाङ्क (श्लोकाङ्क सहित हिन्दी अनुवाद)
अध्याय निश्चित
महाभारत
कर्ण पर्व, अध्याय 24 (आलोचनात्मक संस्करण)
अध्याय निश्चित
पशुपति

सभी प्राणियों के स्वामी

Paśupati

हर प्राणी (पशु) के स्वामी — और शैव दर्शन में हर बंधी हुई आत्मा के, जिसे वे उसके बंधनों (पाश) से मुक्त करते हैं।

प्रतिमा-लक्षण और स्रोत
  • काठमांडू के पशुपतिनाथ में पंचमुखी लिंग के रूप में पूजित।
  • शैव सिद्धांत की त्रयी: पति (ईश्वर), पशु (आत्मा), पाश (बंधन)।
रुद्र के वैदिक सूक्त
संहिताओं में ‘पशुपति’ विशेषण
विशिष्ट स्थलों की सूची बनानी है।
शोध जारी
चन्द्रशेखर

चंद्रमा को मस्तक पर धारण करने वाले

Candraśekhara

अर्धचंद्र धारण किए शिव। सोमनाथ की कथा में क्षय का श्राप पाए चंद्रमा को उनकी शरण मिलती है।

प्रतिमा-लक्षण और स्रोत
  • जटाओं में, प्रायः बाईं ओर, अर्धचंद्र।
  • शिव के लगभग हर रूप में — उनका सबसे स्थायी चिह्न।
शिव पुराण
कोटिरुद्र संहिता, अध्याय 14 (सोमनाथ ज्योतिर्लिंग)
क्रमांकन: गीताप्रेस, गोरखपुर — कल्याण श्रीशिवमहापुराणाङ्क (श्लोकाङ्क सहित हिन्दी अनुवाद)
अध्याय निश्चित