हे ईशान! मैं आप ईश्वर को नमन करता हूँ, जो मोक्ष-स्वरूप हैं, विभु हैं, व्यापक हैं, ब्रह्म और वेद के स्वरूप हैं। जो अपने आप में स्थित, निर्गुण, निर्विकल्प और इच्छा-रहित हैं; चेतना के आकाश, आकाश में ही वास करने वाले — उन्हें मैं भजता हूँ।
तुलसीदास ने यह स्तुति एक ब्राह्मण के मुख से कहलवाई है, जो अपने शिष्य के लिए शिव से क्षमा माँगता है। यह संस्कृत में है, अवधी के रामचरितमानस के भीतर।
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मूल पाठ
नमामीशमीशान निर्वाणरूपं
विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम् ।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं
चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहम् ॥
namāmīśam īśāna nirvāṇa-rūpaṃ
vibhuṃ vyāpakaṃ brahma-veda-svarūpam |
nijaṃ nirguṇaṃ nirvikalpaṃ nirīhaṃ
cid-ākāśam ākāśa-vāsaṃ bhaje'ham ||
अनुवाद
हे ईशान! मैं आप ईश्वर को नमन करता हूँ, जो मोक्ष-स्वरूप हैं, विभु हैं, व्यापक हैं, ब्रह्म और वेद के स्वरूप हैं। जो अपने आप में स्थित, निर्गुण, निर्विकल्प और इच्छा-रहित हैं; चेतना के आकाश, आकाश में ही वास करने वाले — उन्हें मैं भजता हूँ।
अनुवादक: ॐ नमः शिवाय टीम
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