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तुलसीदास का रामचरितमानस

रुद्राष्टकम्

रुद्राष्टकम् — १
मूल मूल पाठ
नमामीशमीशान निर्वाणरूपंविभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम् ।निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहंचिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहम् ॥
namāmīśam īśāna nirvāṇa-rūpaṃvibhuṃ vyāpakaṃ brahma-veda-svarūpam |nijaṃ nirguṇaṃ nirvikalpaṃ nirīhaṃcid-ākāśam ākāśa-vāsaṃ bhaje'ham ||
अनुवाद अनुवाद — अनुवादक: ॐ नमः शिवाय टीम

हे ईशान! मैं आप ईश्वर को नमन करता हूँ, जो मोक्ष-स्वरूप हैं, विभु हैं, व्यापक हैं, ब्रह्म और वेद के स्वरूप हैं। जो अपने आप में स्थित, निर्गुण, निर्विकल्प और इच्छा-रहित हैं; चेतना के आकाश, आकाश में ही वास करने वाले — उन्हें मैं भजता हूँ।

भाष्य व्याख्या — हमारी टिप्पणी, शास्त्र नहीं

तुलसीदास ने यह स्तुति एक ब्राह्मण के मुख से कहलवाई है, जो अपने शिष्य के लिए शिव से क्षमा माँगता है। यह संस्कृत में है, अवधी के रामचरितमानस के भीतर।

प्रमाण प्रमाण
अध्याय
निश्चित
तुलसीदास का रामचरितमानस
उत्तरकांड, रुद्राष्टक (दोहा 107 के बाद), श्लोक 1
रचयिता (परंपरा अनुसार): गोस्वामी तुलसीदास
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मूल पाठ

नमामीशमीशान निर्वाणरूपं

विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम् ।

निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं

चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहम् ॥

namāmīśam īśāna nirvāṇa-rūpaṃ

vibhuṃ vyāpakaṃ brahma-veda-svarūpam |

nijaṃ nirguṇaṃ nirvikalpaṃ nirīhaṃ

cid-ākāśam ākāśa-vāsaṃ bhaje'ham ||

अनुवाद

हे ईशान! मैं आप ईश्वर को नमन करता हूँ, जो मोक्ष-स्वरूप हैं, विभु हैं, व्यापक हैं, ब्रह्म और वेद के स्वरूप हैं। जो अपने आप में स्थित, निर्गुण, निर्विकल्प और इच्छा-रहित हैं; चेतना के आकाश, आकाश में ही वास करने वाले — उन्हें मैं भजता हूँ।

अनुवादक: ॐ नमः शिवाय टीम

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