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स्तोत्र · 15 पद

शिवताण्डवस्तोत्रम्

परम्परा से लंकापति रावण की रचना माना जाता है

शिवताण्डवस्तोत्र संस्कृत का वह स्तोत्र है जिसमें ताण्डव करते हुए शिव का चित्र खींचा गया है — जटाओं से गिरती गंगा, गले में सर्प, ललाट पर धधकती अग्नि और डमरू की ताल। इसके लम्बे समास पढ़ते समय स्वयं डमरू की तरह गूँजते हैं।

परम्परा इसे लंकापति रावण की रचना मानती है, जो शिव का परम भक्त था। प्रसिद्ध कथा के अनुसार उसने कैलास को उठाना चाहा, शिव ने पैर के अँगूठे से पर्वत दबा दिया, और उसके नीचे दबे रावण ने शिव के प्रसन्न होने तक स्तुति गाई। यह स्तोत्र रामायण या पुराणों में नहीं मिलता; यह स्वतंत्र स्तोत्र के रूप में चला आया है और इसका वास्तविक काल तथा रचयिता निश्चित नहीं है।

छपे हुए पाठों में थोड़ा अन्तर मिलता है। यहाँ सबसे प्रचलित पाठ दिया गया है: पञ्चचामर छन्द में स्तुति के तेरह श्लोक और अन्त में पाठ के फल के दो श्लोक — कुल पन्द्रह। कुछ संस्करणों में फलश्रुति से पहले दो श्लोक और मिलते हैं (“निलिम्पनाथनागरी…” और “प्रचण्डवाडवानल…”), जिससे संख्या सत्रह हो जाती है; कहीं-कहीं एक-दो शब्दों का पाठभेद भी है।

भक्त इसे सायंकाल, सोमवार, प्रदोष और महाशिवरात्रि पर पढ़ते हैं — प्रायः ऊँचे स्वर में और तेज़ लय में, नटराज को अर्पित नाद की तरह।

पूरा पाठ

  1. 1
    जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले
    गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम् ।
    डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं
    चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् ॥ १ ॥
    jaṭāṭavīgalajjalapravāhapāvitasthale
    gale’valambya lambitāṃ bhujaṅgatuṅgamālikām |
    ḍamaḍḍamaḍḍamaḍḍamanninādavaḍḍamarvayaṃ
    cakāra caṇḍatāṇḍavaṃ tanotu naḥ śivaḥ śivam || 1 ||

    जटाओं के वन से गिरती जलधारा से पवित्र हुई भूमि पर, गले में बड़े सर्प की माला लटकाए, डमरू के डम-डम नाद के साथ शिव ने प्रचण्ड ताण्डव किया। वे शिव हमारा कल्याण करें।

  2. 2
    जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी-
    विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि ।
    धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके
    किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ॥ २ ॥
    jaṭākaṭāhasambhramabhramannilimpanirjharī-
    vilolavīcivallarīvirājamānamūrdhani |
    dhagaddhagaddhagajjvalallalāṭapaṭṭapāvake
    kiśoracandraśekhare ratiḥ pratikṣaṇaṃ mama || 2 ||

    जिनकी जटाओं के कड़ाह में घूमती देवनदी गंगा की चंचल लहरें मस्तक पर शोभा देती हैं, जिनके ललाट पर धक-धक करती अग्नि जल रही है और शीश पर बाल-चन्द्र है — उन शिव में मेरा प्रेम हर क्षण बना रहे।

  3. 3
    धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धुबन्धुर-
    स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे ।
    कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि
    क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥ ३ ॥
    dharādharendranandinīvilāsabandhubandhura-
    sphuraddigantasantatipramodamānamānase |
    kṛpākaṭākṣadhoraṇīniruddhadurdharāpadi
    kvaciddigambare mano vinodametu vastuni || 3 ||

    जो पर्वतराज की पुत्री पार्वती के विलास के साथी हैं, जिनका मन उनकी दिशाओं तक फैली कान्ति से प्रसन्न रहता है, और जिनकी कृपा-दृष्टि कठिन से कठिन विपत्ति को रोक देती है — उन दिगम्बर शिव में मेरा मन आनन्द पाए।

  4. 4
    जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा-
    कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे ।
    मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे
    मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि ॥ ४ ॥
    jaṭābhujaṅgapiṅgalasphuratphaṇāmaṇiprabhā-
    kadambakuṅkumadravapraliptadigvadhūmukhe |
    madāndhasindhurasphurattvaguttarīyamedure
    mano vinodamadbhutaṃ bibhartu bhūtabhartari || 4 ||

    जटाओं में लिपटे सर्पों के फणों की मणियों की पीली आभा दिशाओं के मुख पर मानो केसर मल देती है, और मदमत्त हाथी की खाल जिनका चमकता उत्तरीय है — उन भूतनाथ में मेरा मन अद्भुत आनन्द पाए।

  5. 5
    सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर-
    प्रसूनधूलिधोरणीविधूसराङ्घ्रिपीठभूः ।
    भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटकः
    श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः ॥ ५ ॥
    sahasralocanaprabhṛtyaśeṣalekhaśekhara-
    prasūnadhūlidhoraṇīvidhūsarāṅghripīṭhabhūḥ |
    bhujaṅgarājamālayā nibaddhajāṭajūṭakaḥ
    śriyai cirāya jāyatāṃ cakorabandhuśekharaḥ || 5 ||

    इन्द्र आदि सभी देवताओं के झुके हुए मस्तकों के फूलों की धूल से जिनकी चरण-पीठ धूसर हो गई है, और जिनका जटाजूट सर्पराज की माला से बँधा है — वे चन्द्रशेखर हमें चिरकाल तक श्री प्रदान करें।

  6. 6
    ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा-
    निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम् ।
    सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं
    महाकपालिसम्पदेशिरोजटालमस्तु नः ॥ ६ ॥
    lalāṭacatvarajvaladdhanañjayasphuliṅgabhā-
    nipītapañcasāyakaṃ namannilimpanāyakam |
    sudhāmayūkhalekhayā virājamānaśekharaṃ
    mahākapālisampadeśirojaṭālamastu naḥ || 6 ||

    जिनके ललाट की अग्नि की चिनगारियों ने पाँच बाणों वाले कामदेव को भस्म कर दिया, जिन्हें देवताओं के नायक प्रणाम करते हैं और जिनके शीश पर अमृत-किरणों वाले चन्द्र की कला शोभती है — वे जटाधारी महाकपाली हमारी सम्पदा हों।

  7. 7
    करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल-
    द्धनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके ।
    धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक-
    प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम ॥ ७ ॥
    karālabhālapaṭṭikādhagaddhagaddhagajjvala-
    ddhanañjayāhutīkṛtapracaṇḍapañcasāyake |
    dharādharendranandinīkucāgracitrapatraka-
    prakalpanaikaśilpini trilocane ratirmama || 7 ||

    जिन्होंने अपने विकराल ललाट पर धधकती अग्नि में प्रचण्ड कामदेव की आहुति दे दी, और जो पर्वतराज-पुत्री पार्वती के अंग पर पत्र-रचना करने वाले एकमात्र कलाकार हैं — उन त्रिलोचन में मेरी प्रीति है।

  8. 8
    नवीनमेघमण्डलीनिरुद्धदुर्धरस्फुरत्-
    कुहूनिशीथिनीतमःप्रबन्धबद्धकन्धरः ।
    निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः
    कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरन्धरः ॥ ८ ॥
    navīnameghamaṇḍalīniruddhadurdharasphurat-
    kuhūniśīthinītamaḥprabandhabaddhakandharaḥ |
    nilimpanirjharīdharastanotu kṛttisindhuraḥ
    kalānidhānabandhuraḥ śriyaṃ jagaddhurandharaḥ || 8 ||

    जिनका कण्ठ नए बादलों से घिरी अमावस्या की आधी रात के अन्धकार जैसा श्याम है, जो गंगा को धारण करते हैं, गजचर्म पहनते हैं, चन्द्रमा से शोभित हैं और जगत का भार उठाते हैं — वे शिव हमें श्री प्रदान करें।

  9. 9
    प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा-
    वलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम् ।
    स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं
    गजच्छिदान्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे ॥ ९ ॥
    praphullanīlapaṅkajaprapañcakālimaprabhā-
    valambikaṇṭhakandalīruciprabaddhakandharam |
    smaracchidaṃ puracchidaṃ bhavacchidaṃ makhacchidaṃ
    gajacchidāndhakacchidaṃ tamantakacchidaṃ bhaje || 9 ||

    जिनके कण्ठ में खिले हुए नील कमलों जैसी श्याम कान्ति है; जिन्होंने कामदेव, त्रिपुर, संसार-बन्धन, दक्ष के यज्ञ, गजासुर, अन्धकासुर और स्वयं यमराज का नाश किया — उन शिव को मैं भजता हूँ।

  10. 10
    अखर्वसर्वमङ्गलाकलाकदम्बमञ्जरी-
    रसप्रवाहमाधुरीविजृम्भणामधुव्रतम् ।
    स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं
    गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे ॥ १० ॥
    akharvasarvamaṅgalākalākadambamañjarī-
    rasapravāhamādhurīvijṛmbhaṇāmadhuvratam |
    smarāntakaṃ purāntakaṃ bhavāntakaṃ makhāntakaṃ
    gajāntakāndhakāntakaṃ tamantakāntakaṃ bhaje || 10 ||

    जो सर्वमंगला पार्वती की कलाओं रूपी कदम्ब-मंजरी के मधुर रस का पान करने वाले भ्रमर हैं; जो कामदेव, त्रिपुर, संसार, दक्ष-यज्ञ, गजासुर, अन्धकासुर और यमराज का भी अन्त करने वाले हैं — उन शिव को मैं भजता हूँ।

  11. 11
    जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वस-
    द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट् ।
    धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल-
    ध्वनिक्रमप्रवर्तितप्रचण्डताण्डवः शिवः ॥ ११ ॥
    jayatvadabhravibhramabhramadbhujaṅgamaśvasa-
    dvinirgamatkramasphuratkarālabhālahavyavāṭ |
    dhimiddhimiddhimidhvananmṛdaṅgatuṅgamaṅgala-
    dhvanikramapravartitapracaṇḍatāṇḍavaḥ śivaḥ || 11 ||

    तेज़ी से घूमते सर्पों की फुफकार से जिनके विकराल ललाट की अग्नि और भड़क उठती है, और धिमि-धिमि बजते मृदंग की ऊँची मंगल ध्वनि की ताल पर जिनका प्रचण्ड ताण्डव चलता है — उन शिव की जय हो।

  12. 12
    दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजो-
    र्गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः ।
    तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः
    समप्रवृत्तिकः कदा सदाशिवं भजाम्यहम् ॥ १२ ॥
    dṛṣadvicitratalpayorbhujaṅgamauktikasrajo-
    rgariṣṭharatnaloṣṭhayoḥ suhṛdvipakṣapakṣayoḥ |
    tṛṇāravindacakṣuṣoḥ prajāmahīmahendrayoḥ
    samapravṛttikaḥ kadā sadāśivaṃ bhajāmyaham || 12 ||

    पत्थर और सुन्दर शय्या, सर्प और मोतियों की माला, बहुमूल्य रत्न और मिट्टी का ढेला, मित्र और शत्रु, तिनका और कमलनयनी, प्रजा और सम्राट — इन सबमें समान भाव रखकर मैं कब सदाशिव का भजन करूँगा?

  13. 13
    कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन्
    विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमञ्जलिं वहन् ।
    विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः
    शिवेति मन्त्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् ॥ १३ ॥
    kadā nilimpanirjharīnikuñjakoṭare vasan
    vimuktadurmatiḥ sadā śiraḥsthamañjaliṃ vahan |
    vimuktalolalocano lalāmabhālalagnakaḥ
    śiveti mantramuccaran kadā sukhī bhavāmyaham || 13 ||

    कब मैं गंगा-तट के किसी कुंज की गुफा में रहता हुआ, कुबुद्धि को छोड़कर, सिर पर सदा हाथ जोड़े, नेत्रों की चंचलता त्यागकर, सुन्दर ललाट वाले प्रभु में मन लगाए, “शिव” मंत्र का उच्चारण करता हुआ सुखी होऊँगा?

  14. 14
    इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं
    पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेतिसन्ततम् ।
    हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं
    विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिन्तनम् ॥ १४ ॥
    imaṃ hi nityamevamuktamuttamottamaṃ stavaṃ
    paṭhansmaranbruvannaro viśuddhimetisantatam |
    hare gurau subhaktimāśu yāti nānyathā gatiṃ
    vimohanaṃ hi dehināṃ suśaṅkarasya cintanam || 14 ||

    फलश्रुति: जो मनुष्य इस उत्तमोत्तम स्तोत्र को नित्य पढ़ता, स्मरण करता और कहता है, वह सदा शुद्ध रहता है और शीघ्र ही गुरु-स्वरूप शिव में भक्ति पाता है; दूसरा कोई मार्ग नहीं, क्योंकि शंकर का चिन्तन ही प्राणियों का मोह दूर करता है।

  15. 15
    पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं
    यः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे ।
    तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां
    लक्ष्मीं सदैव सुमुखिं प्रददाति शम्भुः ॥ १५ ॥
    pūjāvasānasamaye daśavaktragītaṃ
    yaḥ śambhupūjanaparaṃ paṭhati pradoṣe |
    tasya sthirāṃ rathagajendraturaṅgayuktāṃ
    lakṣmīṃ sadaiva sumukhiṃ pradadāti śambhuḥ || 15 ||

    अन्तिम श्लोक दूसरे छन्द में है: जो प्रदोष काल में पूजा के अन्त में, शिव-पूजन में मन लगाकर, दशानन रावण का गाया यह स्तोत्र पढ़ता है, उसे — श्लोक के अनुसार — शम्भु रथ, हाथी और घोड़ों से युक्त स्थिर और प्रसन्न लक्ष्मी देते हैं।

पाठ कैसे और कब

यह परंपरा है, शास्त्र का विधान नहीं।

  • परम्परा से इसका पाठ सायंकाल, विशेषकर सूर्यास्त के आसपास प्रदोष काल में किया जाता है — अन्तिम श्लोक में भी यही कहा गया है।
  • प्रायः शिव-पूजा के अन्त में, जल, बिल्वपत्र और दीप अर्पित करने के बाद इसे पढ़ते हैं।
  • सोमवार, प्रदोष, सावन का महीना और महाशिवरात्रि इसके पाठ के प्रिय अवसर हैं।
  • छन्द तेज़ और डमरू जैसी लय वाला है; पहले धीरे-धीरे, पंक्ति-पंक्ति सीखें, फिर गति बढ़ाएँ, ताकि लम्बे समास स्पष्ट रहें।

श्लोक-दर-श्लोक व्याख्या

स्रोत

परंपरा
से
शिव तांडव स्तोत्रम्
स्वतंत्र स्तोत्र, श्लोक १–१५ (स्तुति के १३ और फलश्रुति के २ श्लोक)
परम्परा से रावण-रचित माना जाता है; यह रामायण या किसी पुराण का अंश नहीं है और इसका काल अज्ञात है। यहाँ १५ श्लोकों का पाठ दिया गया है; कुछ संस्करणों में १७ श्लोक और शब्दों के छोटे पाठभेद मिलते हैं।
स्रोत खोलें

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