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स्तोत्र · 9 पद

श्रीरुद्राष्टकम्

गोस्वामी तुलसीदास (श्रीरामचरितमानस में)

श्रीरुद्राष्टकम् भगवान शिव की आठ संस्कृत छंदों की स्तुति है, जिसके अंत में एक फलश्रुति का श्लोक आता है। यह कोई अलग ग्रंथ नहीं है — गोस्वामी तुलसीदास ने इसे श्रीरामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में रखा है, जहाँ अवधी की कथा के बीच यह संस्कृत में आता है।

कथा में काकभुशुण्डिजी गरुड़जी को अपने एक पूर्वजन्म की बात सुनाते हैं। तब वे शिव के अभिमानी भक्त थे और एक बार शिव मंदिर में बैठे हुए अपने गुरु के आने पर उठकर प्रणाम नहीं किया। इस अपमान पर शिवजी ने उन्हें शाप दिया। दयालु गुरु, जो एक ब्राह्मण थे, शिष्य की दशा से दुखी हुए और हाथ जोड़कर शिवजी के सामने यही स्तुति गाई। शिवजी प्रसन्न हुए और शाप को हल्का कर दिया।

इसलिए यह स्तुति मूल रूप से किसी दूसरे के लिए माँगी गई कृपा की प्रार्थना है। इसमें पहले शिव के निराकार, वाणी से परे स्वरूप का वर्णन है, फिर जटाओं में गंगा और ललाट पर चंद्रमा धारण करने वाले रूप का, और अंत में सीधा-सा समर्पण — “मैं न योग जानता हूँ, न जप, न पूजा।”

यहाँ पाठ श्रीरामचरितमानस के अनुसार दिया गया है, स्तोत्र-पुस्तकों में प्रचलित वर्तनी में। अलग-अलग छपे संस्करणों में वर्तनी और पद-विभाग के छोटे अंतर मिलते हैं; शब्द वही हैं।

पूरा पाठ

  1. 1
    नमामीशमीशान निर्वाणरूपं
    विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम् ।
    निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं
    चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहम् ॥ १ ॥
    namāmīśamīśāna nirvāṇarūpaṃ
    vibhuṃ vyāpakaṃ brahmavedasvarūpam |
    nijaṃ nirguṇaṃ nirvikalpaṃ nirīhaṃ
    cidākāśamākāśavāsaṃ bhaje’ham || 1 ||

    हे ईशान, मोक्षस्वरूप, सर्वव्यापी, ब्रह्म और वेदस्वरूप प्रभु, मैं आपको नमस्कार करता हूँ। जो अपने स्वरूप में स्थित, गुणों से परे, भेद और इच्छा से रहित हैं, चेतना के आकाश-रूप हैं और आकाश में ही वास करते हैं, उन्हें मैं भजता हूँ।

  2. 2
    निराकारमोङ्कारमूलं तुरीयं
    गिराज्ञानगोतीतमीशं गिरीशम् ।
    करालं महाकालकालं कृपालं
    गुणागारसंसारपारं नतोऽहम् ॥ २ ॥
    nirākāramoṅkāramūlaṃ turīyaṃ
    girājñānagotītamīśaṃ girīśam |
    karālaṃ mahākālakālaṃ kṛpālaṃ
    guṇāgārasaṃsārapāraṃ nato’ham || 2 ||

    जो निराकार हैं, ओंकार के मूल हैं, तुरीय अवस्था में स्थित हैं, वाणी, ज्ञान और इंद्रियों से परे कैलासपति हैं, उन्हें मैं नमस्कार करता हूँ। वे विकराल हैं, महाकाल के भी काल हैं, फिर भी कृपालु हैं; गुणों के धाम हैं और संसार से परे हैं।

  3. 3
    तुषाराद्रिसंकाशगौरं गभीरं
    मनोभूतकोटिप्रभाश्रीशरीरम् ।
    स्फुरन्मौलिकल्लोलिनी चारुगङ्गा
    लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजङ्गा ॥ ३ ॥
    tuṣārādrisaṃkāśagauraṃ gabhīraṃ
    manobhūtakoṭiprabhāśrīśarīram |
    sphuranmaulikallolinī cārugaṅgā
    lasadbhālabālendu kaṇṭhe bhujaṅgā || 3 ||

    वे हिमालय के समान गौर वर्ण और गंभीर हैं, उनके शरीर में करोड़ों कामदेवों की शोभा और कांति है। उनके सिर पर सुंदर गंगाजी लहराती हैं, ललाट पर बाल चंद्रमा शोभित है और गले में सर्प है।

  4. 4
    चलत्कुण्डलं भ्रूसुनेत्रं विशालं
    प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम् ।
    मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं
    प्रियं शङ्करं सर्वनाथं भजामि ॥ ४ ॥
    calatkuṇḍalaṃ bhrūsunetraṃ viśālaṃ
    prasannānanaṃ nīlakaṇṭhaṃ dayālam |
    mṛgādhīśacarmāmbaraṃ muṇḍamālaṃ
    priyaṃ śaṅkaraṃ sarvanāthaṃ bhajāmi || 4 ||

    जिनके कानों में कुंडल हिल रहे हैं, जिनकी भौंहें और विशाल नेत्र सुंदर हैं, जिनका मुख प्रसन्न है, कंठ नीला है और जो दयालु हैं; जो सिंह की खाल पहनते और मुंडों की माला धारण करते हैं — उन सबके नाथ, प्यारे शंकर को मैं भजता हूँ।

  5. 5
    प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं
    अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशम् ।
    त्रयःशूलनिर्मूलनं शूलपाणिं
    भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यम् ॥ ५ ॥
    pracaṇḍaṃ prakṛṣṭaṃ pragalbhaṃ pareśaṃ
    akhaṇḍaṃ ajaṃ bhānukoṭiprakāśam |
    trayaḥśūlanirmūlanaṃ śūlapāṇiṃ
    bhaje’haṃ bhavānīpatiṃ bhāvagamyam || 5 ||

    जो प्रचंड, सर्वश्रेष्ठ, तेजस्वी, परमेश्वर हैं; अखंड, अजन्मा और करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाशमान हैं; जो हाथ में त्रिशूल लिए तीनों प्रकार के दुखों को जड़ से मिटा देते हैं — भाव से प्राप्त होने वाले उन भवानीपति को मैं भजता हूँ।

  6. 6
    कलातीतकल्याण कल्पान्तकारी
    सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी ।
    चिदानन्दसंदोह मोहापहारी
    प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ॥ ६ ॥
    kalātītakalyāṇa kalpāntakārī
    sadā sajjanānandadātā purārī |
    cidānandasaṃdoha mohāpahārī
    prasīda prasīda prabho manmathārī || 6 ||

    हे प्रभो, आप कलाओं से परे, कल्याणस्वरूप और कल्प का अंत करने वाले हैं। हे त्रिपुरारि, आप सज्जनों को सदा आनंद देते हैं। आप चिदानंद के भंडार और मोह को हरने वाले हैं। हे कामदेव के शत्रु, प्रसन्न हों, प्रसन्न हों।

  7. 7
    न यावद् उमानाथपादारविन्दं
    भजन्तीह लोके परे वा नराणाम् ।
    न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं
    प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासम् ॥ ७ ॥
    na yāvad umānāthapādāravindaṃ
    bhajantīha loke pare vā narāṇām |
    na tāvatsukhaṃ śānti santāpanāśaṃ
    prasīda prabho sarvabhūtādhivāsam || 7 ||

    जब तक मनुष्य उमापति के चरणकमलों को नहीं भजते, तब तक उन्हें न इस लोक में और न परलोक में सुख-शांति मिलती है, न उनके संताप मिटते हैं। हे सब प्राणियों में बसने वाले प्रभो, प्रसन्न हों।

  8. 8
    न जानामि योगं जपं नैव पूजां
    नतोऽहं सदा सर्वदा शम्भु तुभ्यम् ।
    जराजन्मदुःखौघतातप्यमानं
    प्रभो पाहि आपन्नमामीश शम्भो ॥ ८ ॥
    na jānāmi yogaṃ japaṃ naiva pūjāṃ
    nato’haṃ sadā sarvadā śambhu tubhyam |
    jarājanmaduḥkhaughatātapyamānaṃ
    prabho pāhi āpannamāmīśa śambho || 8 ||

    मैं न योग जानता हूँ, न जप, न ही पूजा। हे शम्भो, मैं तो सदा-सर्वदा बस आपको नमस्कार करता हूँ। बुढ़ापे और जन्म के दुखों से जल रहे, शरण में आए मुझ दुखी की, हे प्रभो, हे ईश्वर, रक्षा कीजिए।

  9. फलश्रुति
    रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये ।
    ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति ॥
    rudrāṣṭakamidaṃ proktaṃ vipreṇa haratoṣaye |
    ye paṭhanti narā bhaktyā teṣāṃ śambhuḥ prasīdati ||

    यह रुद्राष्टक उस ब्राह्मण ने शिवजी को प्रसन्न करने के लिए कहा था। श्लोक कहता है कि जो मनुष्य इसे भक्ति से पढ़ते हैं, उन पर शम्भु प्रसन्न होते हैं।

पाठ कैसे और कब

यह परंपरा है, शास्त्र का विधान नहीं।

  • परंपरा से इसका पाठ नित्य शिव-पूजा में, प्रातः या संध्या के समय, प्रायः शिवलिंग पर जल चढ़ाने के बाद किया जाता है।
  • बहुत-से भक्त इसे सोमवार, प्रदोष, सावन के महीने और महाशिवरात्रि पर पढ़ते हैं।
  • इसका छंद (भुजंगप्रयात) सधी हुई लय वाला है, इसलिए इसे प्रायः गाकर पढ़ा जाता है; मन में शांत भाव से भी पढ़ सकते हैं।
  • श्रीरामचरितमानस के पूरे पाठ में यह उत्तरकाण्ड में अपने स्थान पर आता है।
  • स्तुति स्वयं केवल भक्ति और सच्चा मन माँगती है — अंतिम छंद कहता है, “मैं न योग जानता हूँ, न जप, न पूजा।”

श्लोक-दर-श्लोक व्याख्या

स्रोत

श्लोक
निश्चित
तुलसीदास का रामचरितमानस
उत्तरकाण्ड, दोहा १०७ के बाद का छंद (दोहा १०८ से पहले)
क्रमांकन: दोहा-संख्या गीताप्रेस, गोरखपुर के संस्करण के अनुसार
आठों छंद और अंत का श्लोक तुलसीदासजी के श्रीरामचरितमानस के ही अंग हैं। कुछ अन्य संस्करणों में दोहा-संख्या थोड़ी अलग मिलती है। यहाँ वर्तनी स्तोत्र-पुस्तकों में प्रचलित रूप में है (जैसे अर्धाली के अंत में “म्”), जो मानस में छपी वर्तनी से थोड़ी भिन्न है।
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