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सगरोपाख्यानम्वह वंश जो गिरा, फिर उठा, और गंगा की प्रतीक्षा करता रहा

सगर — विष के साथ जन्मा राजा

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शिव पुराण अयोध्या के सूर्यवंश की कथा निर्वासित राजकुमार सत्यव्रत से, जो त्रिशंकु कहलाए, राज्य खो बैठे राजा बाहु तक लाता है, जिनकी विधवा ने शंकर का ध्यान करते हुए और्व मुनि के आश्रम में पुत्र को जन्म दिया। वही पुत्र सगर — जो उसे मारने के लिए दिए गए विष के साथ ही जन्मा — पृथ्वी को फिर जीत लाया, कपिल के नेत्रों की अग्नि में साठ हज़ार पुत्र खो बैठा, और वह वंश छोड़ गया जिसमें आगे भगीरथ और राम हुए।

मेरी कथाएँ
कथा कथा — नीचे दिए ग्रंथों के आधार पर, हमारे शब्दों में

निकाला गया राजकुमार

सूतजी ऋषियों को इक्ष्वाकु का वंश सुना रहे हैं — एक के बाद एक राजा। मान्धाता के वंशजों में वे त्रय्यारुणि नाम के एक विद्वान राजा तक पहुँचते हैं, और त्रय्यारुणि के बलवान पुत्र सत्यव्रत तक। यहाँ नामों की सूची धीमी पड़ती है और कथा बन जाती है।

सत्यव्रत ने एक उद्दंड काम किया। नगर की एक कन्या का विवाह किसी और से हो रहा था; ब्राह्मण विवाह के मंत्र पढ़ ही रहे थे कि राजकुमार ने आसक्ति, मद और अपनी मनमानी में उसे बलपूर्वक हर लिया। पिता बहुत क्रुद्ध हुए। उन्होंने पुत्र को त्याग दिया और बार-बार कहा, “चले जाओ।”

“मैं कहाँ जाऊँ?” राजकुमार ने पूछा। राजा बोले, “चांडालों के पास रहो।” इस तरह अपने धर्मनिष्ठ पिता से त्यागा गया सत्यव्रत चांडालों की बस्ती के किनारे रहने लगा।

पुत्र के इस कर्म से मन उचट जाने पर राजा स्वयं सब कुछ छोड़कर भगवान शंकर की तपस्या करने वन चले गए। और पुराण कहता है कि उस अधर्म के कारण इंद्र ने बारह वर्ष तक उस राज्य में वर्षा नहीं की।

मुनि-पत्नी और गले में रस्सी वाला बालक

उन्हीं वर्षों में महातपस्वी विश्वामित्र अपनी पत्नी को सत्यव्रत के रहने की जगह के पास छोड़कर कठोर तप के लिए समुद्र-तट पर चले गए। अकाल ने उन्हें घेर लिया। बाक़ी बच्चों का पेट भरने के लिए उन्होंने अपने मँझले बेटे के गले में रस्सी बाँधी और उसे सौ गायों के बदले बेचने निकल पड़ीं।

सत्यव्रत ने उन्हें बालक को ले जाते देखा और उसे छुड़ा लिया। दया से, और विश्वामित्र को प्रसन्न करने की आशा से, उसने उस बालक के पालन का भार उठा लिया। गले — “गल” — से बाँधे जाने के कारण विश्वामित्र का वह पुत्र गालव नाम से प्रसिद्ध हुआ और आगे चलकर बड़ा तपस्वी बना।

तब से सत्यव्रत ही मुनि के पूरे परिवार को जीवित रखता रहा। वह हिरन, सूअर, भैंसे और दूसरे वन-पशुओं का शिकार करता और रोज़ उनका मांस विश्वामित्र के आश्रम के पास रख आता। यह वह सेवा-भाव से, करुणा से और अपने दिए हुए वचन के कारण करता था।

वसिष्ठ का मौन

बूढ़े राजा के वन चले जाने पर कुल-पुरोहित होने के नाते वसिष्ठ मुनि राज्य, उसके तीर्थों और राजमहल की देखभाल करने लगे। जब राजकुमार निकाला गया था तब वे कुछ नहीं बोले थे, और सत्यव्रत के मन में यह बात गड़ी हुई थी।

पुराण वह बात बताता है जो राजकुमार नहीं समझ सका। वह कहता है कि विवाह तो सातवें पग पर ही पूरा होता है। वसिष्ठ का विचार यह था कि निर्वासन के ये वर्ष अपने-आप में प्रायश्चित्त का व्रत बन जाएँगे: पिता संतुष्ट हो जाएँगे, कुल शुद्ध हो जाएगा, और वह मौन-व्रत पूरा होने पर वे स्वयं राजकुमार का अभिषेक करेंगे। इसीलिए वे चुप रहे थे। सत्यव्रत को केवल वह चुप्पी दिखी, और दोनों के बीच क्रोध बना रहा।

तीन दोष: त्रिशंकु

बारह वर्ष तक राजकुमार ने वह कठिन जीवन निभाया। फिर एक दिन कहीं भी मांस नहीं मिला। भूख से व्याकुल, और क्रोध, लोभ तथा मोह के वश होकर उसकी दृष्टि वसिष्ठ की ही गाय पर पड़ी — वह गाय जो हर कामना पूरी करती थी। उसने उसे मार डाला, उसका मांस स्वयं खाया और विश्वामित्र के पुत्र को भी खिलाया।

वसिष्ठ ने सुना तो क्रोध में बोले: “अरे क्रूर! यदि तूने ये दो नए शंकु न गाड़े होते, तो मैं पहला अवश्य निकाल देता। तूने पिता को अप्रसन्न किया; गुरु की गाय मारी; और बिना संस्कार किया हुआ मांस खाया। तीन अपराध — इसलिए तू त्रिशंकु होगा।” शंकु का अर्थ है खूँटा या काँटा, और उसी दिन से वह इसी नाम से जाना गया।

विश्वामित्र की कृतज्ञता

फिर विश्वामित्र तप करके घर लौटे और जाना कि उनकी पत्नी और बच्चों को किसने जीवित रखा। उन्होंने त्रिशंकु से वर माँगने को कहा। राजकुमार ने माँगा, और मुनि ने प्रसन्न होकर वह वर दे दिया।

बारह वर्ष का सूखा समाप्त हुआ। विश्वामित्र ने त्रिशंकु का उसके पिता के सिंहासन पर अभिषेक किया और उसका यज्ञ कराया। और फिर, वसिष्ठ और सब देवताओं के देखते-देखते, उन समर्थ मुनि ने उसे शरीर सहित स्वर्ग भेज दिया।

हरिश्चंद्र से बाहु तक

त्रिशंकु की पत्नी सत्यरथा ने, जो केकय-वंश की राजकुमारी थीं, निष्पाप पुत्र हरिश्चंद्र को जन्म दिया — जिन्हें त्रैशंकव, यानी “त्रिशंकु का पुत्र”, भी कहा गया — जिन्होंने राजसूय यज्ञ किया और चक्रवर्ती राजा के रूप में प्रसिद्ध हुए। हरिश्चंद्र के पुत्र रोहित हुए, रोहित के पुत्र वृक, और वृक से बाहु।

बाहु उस धर्म-युग के योग्य नहीं निकले। वे व्यसनों में डूबे राजा थे, और हैहयों तथा तालजंघों ने उनका सारा राज्य छीन लिया। उन्हें सहायता भी मिली: पुराण पाँच गणों के नाम लेता है — यवन, पारद, काम्बोज, पह्लव और बहूदक — जिन्होंने शकों के साथ हैहयों के लिए युद्ध किया और बाहु का राज्य उन्हें सौंप दिया।

विष के साथ जन्म

यहाँ शौनक बीच में पूछते हैं कि कोई बालक “विष के साथ” कैसे जन्म ले सकता है, और सूतजी वही दोहराते हैं जो कभी वैशम्पायन ने परीक्षित के पुत्र जनमेजय से कहा था।

राज्य खोकर दुखी बाहु अपनी पत्नी के साथ वन चले गए, और वहीं उनका देहांत हो गया। उनकी रानी यादवी के गर्भ में उनका बालक था। होने वाले पुत्र से जलकर एक सौत ने उन्हें विष दे दिया था।

रानी ने पति की चिता सजाई और अग्नि में प्रवेश करने ही वाली थीं कि भृगुवंशी और्व मुनि ने दया करके उन्हें रोक लिया। गर्भ की रक्षा के लिए वे उन्हीं के आश्रम में रहने लगीं। पुराण कहता है कि वहाँ वे महामुनि की सेवा करतीं और मन ही मन शंकर का ध्यान करती रहीं।

समय आने पर, शुभ मुहूर्त में, बलवान लग्न में जब पाँच ग्रह उच्च के थे, बालक का जन्म हुआ — और विष भी उसके साथ बाहर आ गया। “गर” का अर्थ है विष; उसी के साथ, स-गर, जन्म लेने से वह बालक सगर कहलाया।

और्व का शिष्य पृथ्वी लौटा लाता है

और्व ने उसके जातकर्म आदि संस्कार किए, उसे वेद और शास्त्र पढ़ाए, और फिर अस्त्र-विद्या सिखाई। सबसे अंत में उन्होंने उसे आग्नेयास्त्र दिया, जिसे पुराण के अनुसार देवता भी कठिनाई से सह सकते थे। सगर ने उसे प्रसन्नता से और विधिपूर्वक ग्रहण किया।

फिर उसने सेना जुटाई और क्रोध में भरकर, उस अस्त्र के बल से, शीघ्र ही हैहयों का नाश कर दिया। उसका यश लोकों में फैल गया, और उसने धर्म को फिर से स्थापित किया।

उसके हाथों मारे जाते हुए शक, यवन, काम्बोज और पह्लव भयभीत होकर वसिष्ठ की शरण में भागे। वसिष्ठ ने कुछ शर्तों पर उन्हें अभय दिया और सगर को उनका वध करने से रोक दिया।

सगर को अपनी प्रतिज्ञा भी निभानी थी और गुरु का वचन भी रखना था, इसलिए उसने दोनों का रास्ता निकाला। उसने उनके प्राण छोड़ दिए, पर उनके पुराने आचार छीन लिए और उनका वेश बदल दिया। शकों को आधा सिर मुँडवाकर छोड़ा, यवनों और काम्बोजों को पूरा सिर मुँडवाकर; पारदों के केश कटवा दिए, पह्लवों को दाढ़ी रखवा दी, और सबको वेदाध्ययन तथा वषट्कार से बाहर कर दिया। इस तरह धर्म से जीतते हुए वह सारी पृथ्वी का स्वामी बना।

अश्व, खुदाई और कपिल

पृथ्वी जीत लेने पर सगर ने अश्वमेध के लिए एक घोड़े का संस्कार कराया और उसे छोड़ दिया। वह घूमता हुआ पूर्व-दक्षिण समुद्र के तट पर पहुँचा; राजा के साठ हज़ार पुत्र उसके पीछे-पीछे चल रहे थे। वहाँ अपना स्वार्थ साधने वाले देवराज इंद्र ने उसे तट से चुरा लिया और धरती के नीचे छिपा दिया।

घोड़े को खोजने के लिए सगर ने अपने पुत्रों से वह सारा प्रदेश चारों ओर से खुदवा डाला। खोदते-खोदते, जो आगे महासागर बना उसी में, उन्हें भगवान कपिल मिले — वे आदिपुरुष, जिनका रूप ही यह विश्व है।

वे जागे। उनके नेत्रों से अग्नि निकली, और साठ हज़ार जल गए। पुराण कहता है कि वंश चलाने के लिए केवल चार बचे: हर्षकेतु, सुकेतु, धर्मरथ और पराक्रमी पंचजन।

तब कपिल ने पाँच वर दिए: अटूट वंश, विद्या, कीर्ति, धन — और पुत्र के रूप में स्वयं समुद्र। उसी से समुद्र “सागर”, यानी सगर का पुत्र, कहलाया। समुद्र से ही राजा को अपना यज्ञ का घोड़ा वापस मिला। आगे उसने सौ अश्वमेध यज्ञ पूरे किए, और शिव की विभूतियों तथा देवताओं का पूजन किया।

दो रानियाँ और बीजों से भरी तुम्बी

इसके बाद शौनक पूछते हैं कि साठ हज़ार पुत्र जन्मे ही कैसे। सूतजी कहते हैं कि सगर की दो पत्नियाँ थीं। उन्होंने तपस्या से अपने पाप जला डाले, और उनसे प्रसन्न होकर और्व ने दोनों को वर देने की बात कही।

एक ने साठ हज़ार महाबली पुत्र माँगे। दूसरी ने अपनी इच्छा से वंश चलाने वाला एक ही पुत्र चुना। समय आने पर पहली रानी ने बीजों से भरी एक तुम्बी को जन्म दिया, और हर बीज एक बालक था। शिशुओं को अलग-अलग घी के घड़ों में रखा गया, और धाइयों ने क्रम से उन्हें पाला। बड़े होकर वे पिता के आनंद बने — और वही कपिल के क्रोध में जलकर भस्म हुए।

दूसरी रानी का पुत्र पंचजन सगर के बाद राजा हुआ।

भगीरथ, राम और वंश के अंत तक

पंचजन के पुत्र पराक्रमी अंशुमान हुए; उनके पुत्र दिलीप; और दिलीप के पुत्र भगीरथ — वही, जो नदियों में श्रेष्ठ गंगा को पृथ्वी पर उतार लाए, उन्हें समुद्र तक ले गए और उन्हें अपनी पुत्री बनाया। इसीलिए वे भागीरथी कहलाती हैं, और वह अवतरण अपने-आप में एक अलग कथा है।

भगीरथ से पुराण आगे गिनता है: श्रुतसेन, परम धार्मिक नाभाग, अम्बरीष, सिंधुद्वीप, अयुताजित्, और ऋतुपर्ण, जो पासों के मर्मज्ञ और नल के घनिष्ठ मित्र थे। फिर अनुपर्ण, कल्माषपाद जिन्हें मित्रसह भी कहा गया, सर्वकर्मा, अनरण्य, और इस तरह खट्वांग तक, जो स्वर्ग से लौटे तो जीवन का केवल एक मुहूर्त शेष था, और उसी मुहूर्त में अपनी बुद्धि और सत्य से उन्होंने तीनों लोक पा लिए। उनके बाद दीर्घबाहु, रघु, अज और दशरथ हुए।

दशरथ से राम जन्मे — धर्मात्मा, यशस्वी, विष्णु के अंश, रावण का वध करने वाले, और, पुराण जोड़ता है, महान शिवभक्त। उनकी कथा अनेक पुराणों में कही गई है और रामायण से प्रसिद्ध है, इसलिए सूतजी उसे यहाँ फिर नहीं कहते।

राम के बाद कुश, अतिथि और राजाओं की लंबी पंक्ति आती है। उनमें पुराण हिरण्यनाभ पर ठहरता है, जो योग के आचार्य और जैमिनि के शिष्य थे, और जिनसे कोसल के याज्ञवल्क्य ऋषि ने हृदय की गाँठ काटने वाला अध्यात्म-योग सीखा; और मरु पर, जो सिद्ध योगी हैं और, पुराण के अनुसार, आज भी कलाप ग्राम में मुनियों के साथ रहते हैं तथा कलियुग के अंत में नष्ट हुए सूर्यवंश को फिर चलाएँगे। जो राजा हो चुके, उनकी गिनती बृहद्बल पर समाप्त होती है।

फिर सूतजी आगे होने वाले राजाओं के नाम लेते हैं, बृहद्बल के पुत्र से आरंभ करके — शाक्य, शुद्धोद और प्रसेनजित् उन्हीं में हैं — सुमित्र तक, जिनके साथ कलियुग में यह वंश समाप्त होगा और सत्ययुग में फिर बढ़ेगा।

वे कहते हैं कि यही सूर्य के पुत्र वैवस्वत मनु का वंश है। जो इसे पढ़ता या सुनता है, वह संतान से संपन्न होता है, इस लोक में परम सुख भोगता है और भगवान से सायुज्य पाता है।

॥ इति ॥

कथा पूर्ण

अर्पण

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विचार

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यह कथा कहाँ वर्णित है

अध्याय
निश्चित
शिव पुराण
उमा संहिता, अध्याय 37 — मनुवंशी राजाओं का वर्णन (सत्यव्रत द्वारा दूसरे की वधू का हरण और निर्वासन: 37.47–52; त्रय्यारुणि का शंकर की तपस्या के लिए वन जाना; बारह वर्ष की अनावृष्टि; विश्वामित्र का पत्नी को छोड़ जाना: 37.53–55; गले से बँधा बालक — गालव: 37.56–59)
क्रमांकन: गीताप्रेस, गोरखपुर — कल्याण श्रीशिवमहापुराणाङ्क (श्लोकाङ्क सहित हिन्दी अनुवाद)
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इस संदर्भ का मूल अंश अभी यहाँ नहीं जोड़ा गया है। ऊपर दिया स्थान और संस्करण देखें; कथा हमारे शब्दों में पुनर्कथन है।

अध्याय
निश्चित
शिव पुराण
उमा संहिता, अध्याय 38 — सत्यव्रत, त्रिशंकु और सगर (विश्वामित्र के परिवार का पोषण: 38.1–2; वसिष्ठ का मौन और उनका आशय: 38.3–8; वसिष्ठ की गाय का वध: 38.9–12; तीन दोष और त्रिशंकु नाम: 38.13–14; विश्वामित्र का वर, अभिषेक और सशरीर स्वर्गगमन: 38.15–18; हरिश्चंद्र, रोहित, वृक, बाहु: 38.19–21; संक्षेप में कथा: 38.22–25; शौनक और जनमेजय के प्रश्न: 38.26–28; बाहु का राज्य-नाश; विष: 38.29–33; और्व का रानी को रोकना; शंकर का ध्यान; जन्म: 38.34–37; और्व की शिक्षा और आग्नेयास्त्र: 38.38–39; हैहयों का नाश: 38.40–41; वसिष्ठ की शरण और जातियों का मुंडन: 38.42–46; अश्वमेध का अश्व: 38.47–48; इंद्र की चोरी और खुदाई: 38.49–52; कपिल की अग्नि और चार बचे पुत्र: 38.53–54; कपिल के पाँच वर, पुत्र-रूप समुद्र, सौ अश्वमेध: 38.55–57)
क्रमांकन: गीताप्रेस, गोरखपुर — कल्याण श्रीशिवमहापुराणाङ्क (श्लोकाङ्क सहित हिन्दी अनुवाद)
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अध्याय
निश्चित
शिव पुराण
उमा संहिता, अध्याय 39 — सगर की दोनों पत्नियाँ और वैवस्वत-वंश के राजा (दोनों रानियों को और्व के वर: 39.1–3; बीजों की तुम्बी और घी के घड़े: 39.4–5; पंचजन का राजा होना: 39.6; अंशुमान, दिलीप, भगीरथ और गंगा: 39.7–8; श्रुतसेन से दशरथ तक: 39.9–16; राम: 39.17–18; कुश से बृहद्बल तक, हिरण्यनाभ और मरु सहित: 39.19–31; आगे होने वाले राजा, सुमित्र तक: 39.32–43; श्रवण का फल: 39.44–46)
क्रमांकन: गीताप्रेस, गोरखपुर — कल्याण श्रीशिवमहापुराणाङ्क (श्लोकाङ्क सहित हिन्दी अनुवाद)
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शोध
जारी
वाल्मीकि रामायण
बाल कांड — सगर के सर्ग और त्रिशंकु के सर्ग, दोनों विश्वामित्र द्वारा कहे गए
सर्ग-संख्या संस्करणों में भिन्न है और अभी निश्चित करनी है।
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अध्याय
निश्चित
भागवत पुराण
स्कंध 9, अध्याय 7–8
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शोध
जारी
हरिवंश
हरिवंश पर्व — सूर्यवंश, जैसा वैशम्पायन जनमेजय को सुनाते हैं
शिव पुराण स्वयं कहता है कि वह जनमेजय से कहे गए वैशम्पायन के वचन दोहरा रहा है; अध्याय-संख्या की जाँच बाक़ी है।
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6 में से 4 स्रोत अध्याय या श्लोक तक निश्चित; 2 पर शोध जारी। यह पृष्ठ अभी किसी संपादक द्वारा समीक्षित नहीं है। हम कैसे जाँचते हैं →

कथा के अलग-अलग रूप

  • रामायण और भागवत में दूसरी रानी का इकलौता पुत्र असमंजस है — एक क्रूर राजकुमार, जिसे सगर निकाल देते हैं — और अंशुमान उसी के पुत्र हैं। शिव पुराण के ये अध्याय असमंजस का नाम ही नहीं लेते: यहाँ उत्तराधिकारी पंचजन है, और अंशुमान पंचजन के पुत्र हैं।
  • अधिक प्रचलित कथा में सभी साठ हज़ार पुत्र जल जाते हैं और गंगा के धोने के लिए केवल उनकी भस्म बचती है — जैसा इस साइट के गंगा-अवतरण वाले पृष्ठ पर है, जो रामायण के अनुसार है। यहाँ पुराण कहता है कि चार जीवित बचे, और कपिल स्वयं वर देते हैं, जिनमें सगर के “पुत्र” के रूप में समुद्र भी है।
  • रामायण में इंद्र त्रिशंकु को वापस धकेल देते हैं और वे विश्वामित्र के रचे स्वर्ग में धरती और आकाश के बीच लटके रह जाते हैं। यह वृत्तांत केवल इतना कहता है कि विश्वामित्र ने वसिष्ठ और देवताओं के देखते-देखते उन्हें सशरीर स्वर्ग भेज दिया।
  • इस कथा में शिव केंद्र में नहीं, पृष्ठभूमि में हैं: निर्वासित राजकुमार के पिता शंकर की आराधना के लिए वन जाते हैं, विष खाई हुई रानी सगर को गर्भ में रखते हुए शंकर का ध्यान करती रहती है, सगर शिव की विभूतियों का पूजन करते हैं, और राम को महान शिवभक्त कहा गया है।