जिनकी शक्ति की कोई तुलना नहीं, जिनका ऐश्वर्य सर्वत्र व्याप्त है, स्वामित्व और विभुत्व जिनका स्वभाव कहा गया है — उन अजन्मा, विश्व के रचयिता, सनातन, अविनाशी, महादेव, महात्मा शिव की मैं शरण लेता हूँ।
ये दो श्लोक वायवीय संहिता के आरंभिक नमस्कार के ठीक बाद आते हैं। तीनों मिलकर शरणागति की एक छोटी प्रार्थना बनाते हैं, जो किसी भी पाठ से पहले कही जा सकती है।
निश्चित
स्रोत खोलें
मूल पाठ
शक्तिरप्रतिमा यस्य ह्यैश्वर्यं चापि सर्वगम् ।
स्वामित्वं च विभुत्वं च स्वभावं सम्प्रचक्षते ॥
तमजं विश्वकर्माणं शाश्वतं शिवमव्ययम् ।
महादेवं महात्मानं व्रजामि शरणं शिवम् ॥
śaktir apratimā yasya hy aiśvaryaṃ cāpi sarvagam |
svāmitvaṃ ca vibhutvaṃ ca svabhāvaṃ sampracakṣate ||
tam ajaṃ viśva-karmāṇaṃ śāśvataṃ śivam avyayam |
mahādevaṃ mahātmānaṃ vrajāmi śaraṇaṃ śivam ||
अनुवाद
जिनकी शक्ति की कोई तुलना नहीं, जिनका ऐश्वर्य सर्वत्र व्याप्त है, स्वामित्व और विभुत्व जिनका स्वभाव कहा गया है — उन अजन्मा, विश्व के रचयिता, सनातन, अविनाशी, महादेव, महात्मा शिव की मैं शरण लेता हूँ।
अनुवादक: ॐ नमः शिवाय टीम
यह पाठ संग्रह में मौजूद है; संपादकीय समीक्षा अभी बाकी है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →शिव का केंद्रीय पुराण, सात संहिताओं में: विद्येश्वर, रुद्र (पाँच खंडों में), शतरुद्र, कोटिरुद्र, उमा, कैलास और वायवीय। अध्याय-संख्या संस्करणों में बदलती है; हमारे सभी संदर्भ गीताप्रेस के कल्याण शिवमहापुराणाङ्क के अनुसार हैं।
ग्रंथ-संग्रह में देखें →