जिनके मस्तक की पूजा वसिष्ठ, अगस्त्य और गौतम जैसे श्रेष्ठ मुनि और देवता करते हैं; चंद्र, सूर्य और अग्नि जिनके तीन नेत्र हैं — उन “व”कार स्वरूप शिव को नमस्कार।
चौथा श्लोक — “व” का। कुम्भोद्भव, “घड़े से उत्पन्न”, अगस्त्य ऋषि हैं।
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मूल पाठ
वसिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्य-
मुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय ।
चन्द्रार्कवैश्वानरलोचनाय
तस्मै वकाराय नमः शिवाय ॥
vasiṣṭha-kumbhodbhava-gautamārya-
munīndra-devārcita-śekharāya |
candrārka-vaiśvānara-locanāya
tasmai va-kārāya namaḥ śivāya ||
अनुवाद
जिनके मस्तक की पूजा वसिष्ठ, अगस्त्य और गौतम जैसे श्रेष्ठ मुनि और देवता करते हैं; चंद्र, सूर्य और अग्नि जिनके तीन नेत्र हैं — उन “व”कार स्वरूप शिव को नमस्कार।
अनुवादक: ॐ नमः शिवाय टीम
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