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निर्वाण षट्कम् (आत्म षट्कम्)

मैं शिव हूँ

निर्वाणषट्कम् — १
मूल मूल पाठ
मनोबुद्ध्यहङ्कारचित्तानि नाहंन च श्रोत्रजिह्वे न च घ्राणनेत्रे ।न च व्योम भूमिर्न तेजो न वायुःचिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥
mano-buddhy-ahaṅkāra-cittāni nāhaṃna ca śrotra-jihve na ca ghrāṇa-netre |na ca vyoma bhūmir na tejo na vāyuḥcid-ānanda-rūpaḥ śivo'ham śivo'ham ||
अनुवाद अनुवाद — अनुवादक: ॐ नमः शिवाय टीम

मैं न मन हूँ, न बुद्धि, न अहंकार, न चित्त; न कान, न जीभ, न नाक, न आँखें; न आकाश, न पृथ्वी, न अग्नि, न वायु। मैं चैतन्य और आनंद स्वरूप हूँ — मैं शिव हूँ, मैं शिव हूँ।

भाष्य व्याख्या — हमारी टिप्पणी, शास्त्र नहीं

यहाँ शिव कोई “बाहर” के देवता नहीं जिनकी पूजा हो, बल्कि स्वयं आत्मा हैं। यह स्तोत्र घटाकर समझाता है: जो आप नहीं हैं, वह सब हटा दीजिए — जो शेष रहता है, वही शिव है।

यह शिव की अद्वैत व्याख्या है। शैव सिद्धांत जैसी अन्य शैव परंपराएँ आत्मा और शिव को अलग ढंग से समझती हैं — हम उन दृष्टियों को भी साथ-साथ दिखाएँगे।

प्रमाण प्रमाण
परंपरा
से
निर्वाण षट्कम् (आत्म षट्कम्)
श्लोक 1
रचयिता (परंपरा अनुसार): आदि शंकराचार्य (परंपरा अनुसार)
अर्पण

जो मन में है, अर्पित करें

विचार

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