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ŚvU 3.2

रुद्र एक ही हैं

एको हि रुद्रः
मूल मूल पाठ
एको हि रुद्रो न द्वितीयाय तस्थुर्य इमाँल्लोकानीशत ईशनीभिः ।प्रत्यङ् जनास्तिष्ठति सञ्चुकोचान्तकालेसंसृज्य विश्वा भुवनानि गोपाः ॥
eko hi rudro na dvitīyāya tasthurya imāṃl lokān īśata īśanībhiḥ |pratyaṅ janās tiṣṭhati sañcukocāntakālesaṃsṛjya viśvā bhuvanāni gopāḥ ||
अनुवाद अनुवाद — अनुवादक: ॐ नमः शिवाय टीम

रुद्र वास्तव में एक ही हैं — ज्ञानियों ने किसी दूसरे को स्वीकार नहीं किया — जो अपनी शासन-शक्तियों से इन लोकों पर शासन करते हैं। वे हर प्राणी के भीतर उपस्थित हैं। सारे लोकों को रचकर और उनकी रक्षा करके, अंतकाल में वे उन्हें अपने भीतर समेट लेते हैं।

भाष्य व्याख्या — हमारी टिप्पणी, शास्त्र नहीं

श्वेताश्वतर उपनिषद् उन प्राचीनतम ग्रंथों में है जो रुद्र-शिव को एकमात्र परम सत्य कहते हैं। यहाँ सृष्टि, पालन और संहार तीन देवता नहीं, बल्कि एक ही की तीन गतियाँ हैं।

“किसी दूसरे के लिए नहीं ठहरे” — ब्रह्मज्ञानियों ने उनके अतिरिक्त किसी दूसरे तत्त्व को स्वीकार नहीं किया। यह श्लोक बाद के शैव दर्शन की शास्त्रीय जड़ों में से एक है।

प्रमाण प्रमाण
श्लोक
निश्चित
श्वेताश्वतर उपनिषद्
अध्याय 3, मंत्र 2
ŚvU 3.2
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