जिन्होंने रत्नों के पर्वत (मेरु) को धनुष बनाया, जिनका निवास रजत-पर्वत (कैलास) का शिखर है; जिन्होंने नागराज को प्रत्यंचा और विष्णु को बाण बनाया; जिन्होंने क्षण भर में तीनों पुर जला दिए, जिनकी वंदना स्वर्गवासी करते हैं — उन चंद्रशेखर की मैं शरण लेता हूँ। यम मेरा क्या कर लेगा?
परंपरा यह स्तोत्र बालक मार्कंडेय का बताती है, जो मृत्यु के आने पर लिंग से लिपट गए थे। इसकी टेक — “यम मेरा क्या कर लेगा?” — हर श्लोक को पूरा करती है। पहला श्लोक तीन पंक्तियों में त्रिपुर की पूरी कथा है।
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मूल पाठ
रत्नसानुशरासनं रजताद्रिशृङ्गनिकेतनं
शिञ्जिनीकृतपन्नगेश्वरमच्युताननसायकम् ।
क्षिप्रदग्धपुरत्रयं त्रिदिवालयैरभिवन्दितं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः ॥
ratna-sānu-śarāsanaṃ rajatādri-śṛṅga-niketanaṃ
śiñjinī-kṛta-pannageśvaram acyutānana-sāyakam |
kṣipra-dagdha-pura-trayaṃ tridivālayair abhivanditaṃ
candraśekharam āśraye mama kiṃ kariṣyati vai yamaḥ ||
अनुवाद
जिन्होंने रत्नों के पर्वत (मेरु) को धनुष बनाया, जिनका निवास रजत-पर्वत (कैलास) का शिखर है; जिन्होंने नागराज को प्रत्यंचा और विष्णु को बाण बनाया; जिन्होंने क्षण भर में तीनों पुर जला दिए, जिनकी वंदना स्वर्गवासी करते हैं — उन चंद्रशेखर की मैं शरण लेता हूँ। यम मेरा क्या कर लेगा?
अनुवादक: ॐ नमः शिवाय टीम
यह पाठ संग्रह में मौजूद है; संपादकीय समीक्षा अभी बाकी है।
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