शिव चालीसा
शिव चालीसा भगवान शिव की सबसे प्रचलित हिन्दी स्तुति है — आरम्भ में एक दोहा, फिर सरल अवधी-मिश्रित हिन्दी की चौपाइयाँ और अन्त में दोहा। इसमें शिव के स्वरूप का वर्णन है, उनकी लीलाओं का स्मरण है और अन्त में भक्त की अपनी रक्षा की पुकार है।
रचयिता ने पाठ में ही अपना नाम अयोध्यादास बताया है। अन्तिम दोहे में रचना की तिथि भी दी गई है — मगसर (मार्गशीर्ष) की छठ, हेमन्त ऋतु, “संवत चौसठ” — पर शताब्दी नहीं बताई गई, इसलिए वर्ष निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता और हम अनुमान नहीं लगाते।
इसमें जिन कथाओं का संकेत है वे सुपरिचित हैं: षडानन (कार्तिकेय) द्वारा तारकासुर का वध, जलंधर और त्रिपुरासुर का संहार, भगीरथ के लिए गंगा का अवतरण, समुद्र-मंथन का विष पीकर नीलकण्ठ कहलाना और श्रीराम द्वारा सहस्र कमलों से पूजन।
अलग-अलग छपी पुस्तकों में वर्तनी और कुछ शब्दों का अन्तर मिलता है। यहाँ सबसे अधिक छपने वाला पाठ दिया गया है। गिनने पर इस पाठ में इकतालीस चौपाइयाँ आती हैं — चालीस, और उनके बाद कवि के नाम वाली चौपाई, जिसे हमने 41 क्रमांक दिया है।
पूरा पाठ
- दोहाजय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान।कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥
गिरिजा के पुत्र, मंगल के मूल और परम ज्ञानी श्री गणेश की जय हो। अयोध्यादास विनती करते हैं कि आप अभय का वरदान दें।
- 1जय गिरिजा पति दीन दयाला।सदा करत सन्तन प्रतिपाला॥
गिरिजा के पति, दीनों पर दया करने वाले शिव की जय हो, जो सदा सन्तों की रक्षा और पालन करते हैं।
- 2भाल चन्द्रमा सोहत नीके।कानन कुण्डल नागफनी के॥
आपके मस्तक पर चन्द्रमा सुन्दर शोभा देता है और कानों में नाग के फन जैसे कुण्डल हैं।
- 3अंग गौर शिर गंग बहाये।मुण्डमाल तन क्षार लगाए॥
आपका शरीर गौर वर्ण का है, सिर से गंगा बहती है; गले में मुण्डों की माला है और तन पर भस्म लगी है।
- 4वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे।छवि को देखि नाग मन मोहे॥
बाघ की खाल आपका वस्त्र है और वह आप पर शोभती है; आपकी छवि देखकर नागों का मन भी मोहित हो जाता है।
- 5मैना मातु की हवे दुलारी।बाम अंग सोहत छवि न्यारी॥
माता मैना की दुलारी पार्वती आपके बाएँ अंग में विराजती हैं और उनकी छवि निराली है।
- 6कर त्रिशूल सोहत छवि भारी।करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥
आपके हाथ में त्रिशूल बड़ी शोभा देता है, जो सदा शत्रुओं का नाश करता है।
- 7नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे।सागर मध्य कमल हैं जैसे॥
आपके पास नन्दी और गणेश ऐसे शोभते हैं जैसे सागर के बीच कमल खिले हों।
- 8कार्तिक श्याम और गणराऊ।या छवि को कहि जात न काऊ॥
कार्तिकेय, श्याम और गणराज के साथ इस छवि का वर्णन कोई नहीं कर सकता।
- 9देवन जबहीं जाय पुकारा।तब ही दुख प्रभु आप निवारा॥
देवताओं ने जब-जब जाकर आपको पुकारा, हे प्रभु, आपने तभी उनका दुःख दूर किया।
- 10किया उपद्रव तारक भारी।देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी॥
जब तारकासुर ने भारी उपद्रव मचाया, तब सब देवताओं ने मिलकर आपसे ही गुहार की।
- 11तुरत षडानन आप पठायउ।लवनिमेष महँ मारि गिरायउ॥
आपने तुरन्त षडानन (कार्तिकेय) को भेजा और उन्होंने पल भर में उसे मार गिराया।
- 12आप जलंधर असुर संहारा।सुयश तुम्हार विदित संसारा॥
आपने स्वयं जलंधर असुर का संहार किया; आपका सुयश सारे संसार में प्रसिद्ध है।
- 13त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई।सबहिं कृपा कर लीन बचाई॥
आपने त्रिपुरासुर से युद्ध किया और कृपा करके सबको बचा लिया।
- 14किया तपहिं भागीरथ भारी।पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी॥
भगीरथ ने कठोर तप किया और हे पुरारी, आपने उनकी प्रतिज्ञा पूरी की।
- 15दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं।सेवक स्तुति करत सदाहीं॥
दानियों में आपके समान कोई नहीं है; सेवक सदा आपकी स्तुति करते हैं।
- 16वेद नाम महिमा तव गाई।अकथ अनादि भेद नहिं पाई॥
वेदों ने आपके नाम की महिमा गाई है, फिर भी आप अकथनीय और अनादि हैं — आपका भेद कोई नहीं पा सका।
- 17प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला।जरत सुरासुर भए विहाला॥
समुद्र-मंथन में विष की ज्वाला प्रकट हुई, जिससे जलते हुए देवता और असुर दोनों बेहाल हो गए।
- 18कीन्ही दया तहं करी सहाई।नीलकण्ठ तब नाम कहाई॥
तब आपने दया करके सहायता की, और तभी से आपका नाम नीलकण्ठ पड़ा।
- 19पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा।जीत के लंक विभीषण दीन्हा॥
जब श्री रामचन्द्र ने आपका पूजन किया, तब उन्होंने लंका जीतकर विभीषण को दे दी।
- 20सहस कमल में हो रहे धारी।कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी॥
जब वे सहस्र कमल चढ़ा रहे थे, तब हे पुरारी, आपने उनकी परीक्षा ली।
- 21एक कमल प्रभु राखेउ जोई।कमल नयन पूजन चहं सोई॥
हे प्रभु, आपने एक कमल छिपा लिया; तब कमल-नयन श्रीराम ने अपने नेत्र से ही पूजन पूरा करना चाहा।
- 22कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर।भए प्रसन्न दिए इच्छित वर॥
ऐसी कठिन भक्ति देखकर प्रभु शंकर प्रसन्न हुए और मनचाहा वर दिया।
- 23जय जय जय अनन्त अविनाशी।करत कृपा सब के घटवासी॥
हे अनन्त और अविनाशी, आपकी जय हो, जय हो, जय हो। आप सबके हृदय में बसते हैं और सब पर कृपा करते हैं।
- 24दुष्ट सकल नित मोहि सतावै।भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै॥
सब दुष्ट मुझे नित्य सताते हैं; मैं भटकता रहता हूँ और मुझे चैन नहीं मिलता।
- 25त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो।येहि अवसर मोहि आन उबारो॥
हे नाथ, मैं “रक्षा करो, रक्षा करो” पुकार रहा हूँ; इस घड़ी आकर मुझे उबार लीजिए।
- 26लै त्रिशूल शत्रुन को मारो।संकट से मोहि आन उबारो॥
त्रिशूल लेकर शत्रुओं का नाश कीजिए और आकर मुझे संकट से उबारिए।
- 27मात-पिता भ्राता सब होई।संकट में पूछत नहिं कोई॥
माता, पिता, भाई सब होते हैं, पर संकट में कोई नहीं पूछता।
- 28स्वामी एक है आस तुम्हारी।आय हरहु मम संकट भारी॥
हे स्वामी, केवल आपकी ही आस है; आकर मेरा भारी संकट हर लीजिए।
- 29धन निर्धन को देत सदा हीं।जो कोई जांचे सो फल पाहीं॥
आप निर्धन को सदा धन देते हैं; जो कोई आपसे माँगता है, वह फल पाता है।
- 30अस्तुति केहि विधि करैं तुम्हारी।क्षमहु नाथ अब चूक हमारी॥
मैं आपकी स्तुति किस प्रकार करूँ? हे नाथ, अब मेरी भूल-चूक क्षमा कीजिए।
- 31शंकर हो संकट के नाशन।मंगल कारण विघ्न विनाशन॥
हे शंकर, आप संकट का नाश करने वाले, मंगल के कारण और विघ्नों को मिटाने वाले हैं।
- 32योगी यति मुनि ध्यान लगावैं।शारद नारद शीश नवावैं॥
योगी, यति और मुनि आपका ध्यान करते हैं; शारदा और नारद आपको शीश नवाते हैं।
- 33नमो नमो जय नमः शिवाय।सुर ब्रह्मादिक पार न पाय॥
आपको बार-बार नमन है — जय हो, नमः शिवाय! ब्रह्मा आदि देवता भी आपका पार नहीं पा सके।
- 34जो यह पाठ करे मन लाई।ता पर होत है शम्भु सहाई॥
जो मन लगाकर यह पाठ करता है, शम्भु उसकी सहायता करते हैं।
- 35ऋनियां जो कोई हो अधिकारी।पाठ करे सो पावन हारी॥
चालीसा कहती है कि जो ऋण से दबा हो, वह इसका पाठ करे तो उसका भार उतरता है और वह पवित्र होता है।
- 36पुत्र हीन कर इच्छा जोई।निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई॥
चालीसा कहती है कि जो सन्तानहीन सन्तान की इच्छा करे, उसे शिव की कृपा से वह अवश्य मिलती है।
- 37पण्डित त्रयोदशी को लावे।ध्यान पूर्वक होम करावे॥
त्रयोदशी के दिन पण्डित को बुलाए और ध्यानपूर्वक हवन कराए।
- 38त्रयोदशी व्रत करै हमेशा।ताके तन नहीं रहै कलेशा॥
चालीसा कहती है कि जो सदा त्रयोदशी का व्रत करता है, उसके तन में कोई क्लेश नहीं रहता।
- 39धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे।शंकर सम्मुख पाठ सुनावे॥
धूप, दीप और नैवेद्य चढ़ाए और शंकर के सामने यह पाठ सुनाए।
- 40जन्म जन्म के पाप नसावे।अन्त धाम शिवपुर में पावे॥
चालीसा कहती है कि इससे जन्म-जन्म के पाप नष्ट होते हैं और अन्त में शिवलोक में स्थान मिलता है।
- 41कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी।जानि सकल दुःख हरहु हमारी॥
अयोध्यादास कहते हैं कि मुझे केवल आपकी आस है; यह जानकर मेरे सारे दुःख हर लीजिए।
- दोहानित्त नेम कर प्रातः ही, पाठ करौं चालीसा।तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश॥
मैं नित्य नियम से प्रातःकाल इस चालीसा का पाठ करता हूँ; हे जगदीश, मेरी मनोकामना पूर्ण कीजिए।
- दोहामगसर छठि हेमन्त ऋतु, संवत चौसठ जान।अस्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण॥
मगसर (मार्गशीर्ष) की छठ, हेमन्त ऋतु और संवत चौसठ में शिव की यह स्तुति-चालीसा कल्याण के लिए पूर्ण हुई।
पाठ कैसे और कब
यह परंपरा है, शास्त्र का विधान नहीं।
- परम्परा से इसका पाठ प्रातः स्नान के बाद शिव-प्रतिमा या शिवलिंग के सामने किया जाता है।
- बहुत से भक्त सोमवार, प्रदोष (त्रयोदशी, जिसका उल्लेख पाठ में ही है), पूरे श्रावण मास और महाशिवरात्रि पर इसका पाठ करते हैं।
- पाठ में ही धूप, दीप और नैवेद्य चढ़ाकर शंकर के सम्मुख चालीसा सुनाने की बात कही गई है।
- पाठ धीरे-धीरे, अर्थ पर ध्यान रखते हुए करें — चालीसा स्वयं “मन लाई” अर्थात् मन लगाकर पाठ करने को कहती है।
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