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मल्लिकार्जुन · क्रौञ्चपर्वतकार्तिकेय घर छोड़कर क्रौंच पर्वत चले जाते हैं — और बिछोह न सह पाने वाले शिव-पार्वती ज्योति बनकर वहीं बस जाते हैं

मल्लिकार्जुन: पुत्र के पीछे चले माता-पिता

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पृथ्वी की परिक्रमा करके कैलास लौटे कार्तिकेय को नारद से पता चलता है कि गणेश का विवाह हो चुका है, और माता-पिता के रोकने पर भी वे क्रौंच पर्वत चले जाते हैं। देवता उन्हें लौटा नहीं पाते, और जब स्वयं शिव-पार्वती आते हैं तो वे तीन योजन और दूर चले जाते हैं; तब शिव-पार्वती ज्योति रूप में क्रौंच पर ही मल्लिकार्जुन नामक लिंग बनकर बस जाते हैं — मल्लिका यानी पार्वती, अर्जुन यानी शिव — जो बारह ज्योतिर्लिंगों में दूसरा है।

मेरी कथाएँ
कथा कथा — नीचे दिए ग्रंथों के आधार पर, हमारे शब्दों में

बारह में दूसरा

सोमनाथ की कथा कहने के बाद सूतजी अगले ज्योतिर्लिंग की ओर बढ़ते हैं। अब मैं बताऊँगा, वे कहते हैं, कि मल्लिकार्जुन कैसे प्रकट हुए। जो भक्त इसे सुनता है, वह सब पापों से छूट जाता है।

वे यह भी कहते हैं कि यह कथा वे पहले कह चुके हैं। पुराण में पहले उन्होंने पार्वती-पुत्र कार्तिकेय के चरित्र का वर्णन किया था; अब वही पापनाशक दिव्य कथा वे फिर से कहते हैं, क्योंकि इसी लिंग का आरंभ वहीं से होता है।

कार्तिकेय घर लौटते हैं

इसकी पृष्ठभूमि पुराण की पहली कथा में मिलती है। शिव के दोनों पुत्र पहले विवाह करना चाहते थे, और माता-पिता ने वचन दिया था कि जो पूरी पृथ्वी की परिक्रमा करके पहले लौटेगा, उसी का विवाह पहले होगा। कार्तिकेय तुरंत लंबी यात्रा पर निकल पड़े; गणेश ने वहीं रहकर माता-पिता की पूजा करके उनकी परिक्रमा की, और भाई के लौटने से पहले ही उनका विवाह हो गया। यहाँ सूतजी इन सब बातों का केवल संकेत भर करते हैं।

इसलिए जब तारकासुर का वध करने वाले, पार्वती के बुद्धिमान और महाबली पुत्र कार्तिकेय पृथ्वी की परिक्रमा पूरी करके कैलास लौटे, तब तक विवाह हो चुका था। उसी समय देवर्षि नारद वहाँ आ पहुँचे। अपनी चतुराई से कुमार के मन में उथल-पुथल मचाते हुए उन्होंने गणेश के विवाह और उससे जुड़ी सारी बातें कह सुनाईं।

क्रौंच पर्वत की ओर

कुमार ने सब सुना। माता-पिता ने उन्हें जाने से बहुत रोका, पर वे उन्हें प्रणाम करके चल दिए, और क्रौंच पर्वत पर जा पहुँचे।

पुत्र के बिछोह से पार्वती बहुत दुखी हो गईं। शिव ने उन्हें समझाया। प्रिये, उन्होंने कहा, तुम इतनी उदास क्यों हो? हे पार्वती, हे सुंदर भौंहों वाली, शोक मत करो — तुम्हारा पुत्र अवश्य लौट आएगा। इस भारी दुःख को छोड़ दो।

पर शंकर के बार-बार समझाने पर भी पार्वती का मन शांत नहीं हुआ।

देवता उन्हें लाने जाते हैं

तब शिव ने देवताओं और ऋषियों को कुमार के पास भेजा। गणों को साथ लेकर सभी बुद्धिमान देवता और महर्षि प्रसन्न मन से उन्हें घर लाने चल पड़े।

वहाँ पहुँचकर उन्होंने कुमार को विधिवत प्रणाम किया, तरह-तरह से उन्हें समझाया, और आदर से लौट चलने की प्रार्थना की। पर पुराण कहता है कि कार्तिकेय आहत स्वाभिमान से दहक रहे थे। देवता शिव की आज्ञा लेकर आए थे, फिर भी उन्होंने उनकी प्रार्थना स्वीकार नहीं की।

वे सब लौटकर शिव के पास आए, उन्हें प्रणाम किया, आज्ञा ली और अपने-अपने लोक चले गए। और जब पुत्र नहीं लौटा, तो शिव और पार्वती को संतान से बिछुड़ने का गहरा दुःख हुआ।

माता-पिता पीछे-पीछे

तब संसार के सामान्य लोगों जैसा आचरण दिखाते हुए वे दोनों बहुत उदास और दीन हो गए। अत्यंत स्नेह से विवश होकर वे स्वयं उस स्थान पर गए जहाँ उनका पुत्र कार्तिकेय रह रहा था।

पर कार्तिकेय को पता चल गया कि माता-पिता आ रहे हैं। उनके स्नेह से मुँह मोड़कर वे उस पर्वत को छोड़ तीन योजन और दूर चले गए।

पर्वत पर ज्योति

पुत्र के और दूर चले जाने पर वे दोनों ज्योति का रूप धारण करके वहीं क्रौंच पर्वत पर विराजमान हो गए।

और पुराण कहता है कि आज भी पुत्र-स्नेह से व्याकुल शिव और पार्वती हर पर्व पर कार्तिकेय को देखने वहाँ जाते हैं। अमावस्या के दिन स्वयं शिव वहाँ जाते हैं, और पूर्णिमा के दिन पार्वती अवश्य जाती हैं।

मल्लिका और अर्जुन

उसी दिन से वह अनुपम लिंग, जिसमें मल्लिका और अर्जुन एक साथ हैं, तीनों लोकों में प्रसिद्ध हो गया। पुराण बताता है कि मल्लिका पार्वती हैं और अर्जुन शिव; यह लिंग उन दोनों का एक ही रूप में मिलन है।

फलश्रुति

सूतजी कहते हैं, जो उस लिंग का दर्शन करता है, वह सब पापों से छूट जाता है और सारे मनोरथ पा लेता है — इसमें कोई संदेह नहीं। उसका दुःख पूरी तरह मिट जाता है और उसे परम सुख मिलता है। उसे फिर माता के गर्भ का कष्ट नहीं भोगना पड़ता। उसे धन-धान्य की समृद्धि, मान, आरोग्य और मनचाहा फल मिलता है; इसमें भी कोई संशय नहीं।

सूतजी अंत में कहते हैं, यही मल्लिकार्जुन नाम का दूसरा ज्योतिर्लिंग है, जो केवल दर्शन से सब सुख देता है; लोक-कल्याण के लिए उन्होंने इसका वर्णन किया।

॥ इति ॥

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यह कथा कहाँ वर्णित है

अध्याय
निश्चित
शिव पुराण
कोटिरुद्र संहिता, अध्याय 15 (मल्लिकार्जुन की कथा का आरंभ, पहले कही कथा का पुनः कथन: 15.1–2; कार्तिकेय की वापसी, नारद द्वारा गणेश-विवाह का समाचार: 15.3–4; क्रौंच की ओर प्रस्थान: 15.5; शिव का पार्वती को समझाना: 15.6–7; देवता-ऋषि भेजे जाते हैं, कुमार का इनकार: 15.8–13; माता-पिता का आगमन, तीन योजन दूर जाना: 15.14–15; ज्योति रूप में स्थिति, अमावस्या-पूर्णिमा का आगमन: 15.16–18; मल्लिका और अर्जुन: 15.19; फलश्रुति: 15.20–23)
क्रमांकन: गीताप्रेस, गोरखपुर — कल्याण श्रीशिवमहापुराणाङ्क (श्लोकाङ्क सहित हिन्दी अनुवाद)
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इस संदर्भ का मूल अंश अभी यहाँ नहीं जोड़ा गया है। ऊपर दिया स्थान और संस्करण देखें; कथा हमारे शब्दों में पुनर्कथन है।

अध्याय
निश्चित
शिव पुराण
रुद्र संहिता, कुमार खंड, अध्याय 20 (पहली कथा: नारद की बातें: 20.10–22; क्रौंच की ओर प्रस्थान: 20.23–26; मल्लिकार्जुन और माता-पिता का आगमन: 20.31–37)
क्रमांकन: गीताप्रेस, गोरखपुर — कल्याण श्रीशिवमहापुराणाङ्क (श्लोकाङ्क सहित हिन्दी अनुवाद)
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2 में से 2 स्रोत अध्याय या श्लोक तक निश्चित। यह पृष्ठ अभी किसी संपादक द्वारा समीक्षित नहीं है। हम कैसे जाँचते हैं →

कथा के अलग-अलग रूप

  • पुराण यह कथा दो बार कहता है। कुमार खंड में यह गणेश-विवाह की कथा का समापन है (देखें “पृथ्वी-परिक्रमा की होड़”), और वहाँ शिव पार्वती को सांत्वना देने के लिए अपने एक अंश से क्रौंच जाते हैं। यहाँ कोटिरुद्र संहिता में वही प्रस्थान ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति के रूप में फिर कहा गया है, और इसमें ऐसे विवरण हैं जो पहली कथा में नहीं — कुमार को लाने भेजे गए देवता, उनका तीन योजन और दूर चले जाना, और मल्लिका-अर्जुन के रूप में नाम की व्याख्या।
  • यह अध्याय लिंग को केवल क्रौंच पर्वत पर बताता है। आंध्र प्रदेश के श्रीशैलम् से इसकी पहचान द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र (श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्) और मंदिर-परंपरा से आती है, जहाँ श्रीशैल शक्तिपीठों में भी गिना जाता है और देवी भ्रमरांबा के रूप में पूजी जाती हैं।
  • श्रीशैल की लोक-परंपरा में उत्पत्ति की और कथाएँ भी हैं — जैसे किसी राजकुमारी या भक्त का मल्लिका (चमेली) के फूलों से शिव-पूजन — जो शिव पुराण के इस अध्याय में नहीं हैं।