रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग
“setubandhe tu rāmeśam” — द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र
कथा और स्थान
रामेश्वर तमिलनाडु के रामनाथपुरम ज़िले में रामेश्वरम (पंबन) द्वीप पर है, जो पंबन जलसंधि पर बने रेल और सड़क पुल से मुख्य भूमि से जुड़ा है। मंदिर, जिसे स्थानीय लोग रामनाथस्वामी कहते हैं, समुद्र से थोड़ी ही दूरी पर है। नगर से आगे द्वीप सिकुड़ते-सिकुड़ते धनुषकोडि की रेतीली पट्टी बन जाता है, जो श्रीलंका की ओर बढ़ती है।
शिव पुराण के अनुसार राम अपनी वानर सेना के साथ इस तट पर पहुँचे और सोचने लगे कि समुद्र कैसे पार हो। उन्हें प्यास लगी और उन्होंने जल माँगा। पीने ही वाले थे कि याद आया, आज अभी शिव की पूजा नहीं की है। उन्होंने जल रख दिया, तट की मिट्टी से पार्थिव लिंग बनाया और पूरी श्रद्धा से पूजन किया। शिव पार्वती के साथ प्रकट हुए और उन्हें विजय का आशीर्वाद दिया। तब राम ने प्रार्थना की कि शिव लोक-कल्याण के लिए यहीं रहें। वह लिंग रामेश्वर कहलाया, यानी वे ईश्वर जिनकी राम ने पूजा की।
मंदिर की अपनी परंपरा कथा को कुछ अलग ढंग से कहती है और पूजा को लंका से लौटने के बाद की घटना बताती है: हनुमान को कैलास से शिवलिंग लाने भेजा गया, और जब उन्हें देर हुई तो शुभ मुहूर्त न निकल जाए, इसलिए सीता ने रेत का लिंग बना दिया। मंदिर में दोनों लिंगों की पूजा होती है, और रीति यह है कि पहले हनुमान के लाए लिंग की पूजा की जाती है।
रामेश्वरम कई कारणों से विशेष है। यह ज्योतिर्लिंग होने के साथ-साथ भारत के चार कोनों के चार धामों में से एक है, इसलिए राम और शिव दोनों के भक्तों के लिए पवित्र है। मंदिर अपने बहुत लंबे स्तंभों वाले गलियारों और बाईस तीर्थों के लिए प्रसिद्ध है; ये परिसर के भीतर के कुएँ हैं, जिनमें श्रद्धालु पहले अग्नि तीर्थम् पर समुद्र-स्नान करके फिर बारी-बारी से स्नान करते हैं। परंपरा में बहुत से यात्री इस यात्रा को काशी की यात्रा के साथ जोड़ते हैं।
यात्री के लिए
समय, मार्ग और व्यवस्था बदलती रहती है — जाने से पहले मंदिर की आधिकारिक सूचना देख लें।
- रामेश्वरम का अपना रेलवे स्टेशन है; निकटतम बड़ा शहर और हवाई अड्डा मदुरै है।
- मंदिर समुद्र के पास है; तट पर स्नान का स्थान अग्नि तीर्थम् है।
- दर्शन से पहले मंदिर के भीतर के बाईस तीर्थों में स्नान करने की परंपरा है।
- मंदिर साल भर खुला रहता है। महाशिवरात्रि तथा तमिल महीनों आडि और मासि के मंदिर-उत्सव उल्लेखनीय हैं।
पूरी कथा
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शिव का केंद्रीय पुराण, सात संहिताओं में: विद्येश्वर, रुद्र (पाँच खंडों में), शतरुद्र, कोटिरुद्र, उमा, कैलास और वायवीय। अध्याय-संख्या संस्करणों में बदलती है; हमारे सभी संदर्भ गीताप्रेस के कल्याण शिवमहापुराणाङ्क के अनुसार हैं।
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