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शिव पुराण

आदि और अंत में मंगल

आद्यन्तमङ्गलम्
मूल मूल पाठ
आद्यन्तमङ्गलमजातसमानभाव-मार्यं तमीशमजरामरमात्मदेवम् ।पञ्चाननं प्रबलपञ्चविनोदशीलंसम्भावये मनसि शङ्करमम्बिकेशम् ॥
ādy-anta-maṅgalam ajāta-samāna-bhāvamāryaṃ tam īśam ajarāmaram ātma-devam |pañcānanaṃ prabala-pañca-vinoda-śīlaṃsambhāvaye manasi śaṅkaram ambikeśam ||
अनुवाद अनुवाद — अनुवादक: ॐ नमः शिवाय टीम

जो आदि और अंत में मंगलमय हैं, जिनके समान कोई उत्पन्न ही नहीं हुआ, जो श्रेष्ठ ईश्वर हैं, अजर-अमर हैं, आत्मा के देव हैं; जिनके पाँच मुख हैं और पाँच प्रबल कर्म जिनकी लीला हैं — उन अंबिकापति शंकर का मैं मन में ध्यान करता हूँ।

भाष्य व्याख्या — हमारी टिप्पणी, शास्त्र नहीं

यह शिव पुराण का सबसे पहला श्लोक है — विद्येश्वर संहिता का मंगलाचरण।

“पाँच कर्म” हैं सृष्टि, पालन, संहार, तिरोभाव और अनुग्रह। पुराण आरंभ में ही कहता है कि ये पाँचों उनके लिए खेल हैं।

प्रमाण प्रमाण
श्लोक
निश्चित
शिव पुराण
विद्येश्वर संहिता, अध्याय 1, मंगलाचरण
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मूल पाठ

आद्यन्तमङ्गलमजातसमानभाव-

मार्यं तमीशमजरामरमात्मदेवम् ।

पञ्चाननं प्रबलपञ्चविनोदशीलं

सम्भावये मनसि शङ्करमम्बिकेशम् ॥

ādy-anta-maṅgalam ajāta-samāna-bhāvam

āryaṃ tam īśam ajarāmaram ātma-devam |

pañcānanaṃ prabala-pañca-vinoda-śīlaṃ

sambhāvaye manasi śaṅkaram ambikeśam ||

अनुवाद

जो आदि और अंत में मंगलमय हैं, जिनके समान कोई उत्पन्न ही नहीं हुआ, जो श्रेष्ठ ईश्वर हैं, अजर-अमर हैं, आत्मा के देव हैं; जिनके पाँच मुख हैं और पाँच प्रबल कर्म जिनकी लीला हैं — उन अंबिकापति शंकर का मैं मन में ध्यान करता हूँ।

अनुवादक: ॐ नमः शिवाय टीम

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