तीन नगरों के संहारक
वह धनुर्धर जिसने तीन उड़ते नगरों को एक ही बाण से, उनके एक सीध में आने के उसी क्षण जला दिया — और सारा ब्रह्मांड जिनका रथ बना।
अन्य नाम: Tripurāri · Purāri · Tripurahara · Pinākī
उन्हें कैसे पहचानें
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यह रूप क्या सिखाता है
त्रिपुरांतक एक ही बाण वाले धनुर्धर शिव हैं। तारक के तीन पुत्रों ने ऐसा वर पाया जो उन्हें सदा सुरक्षित लगता था: तीन उड़ते नगर — सोने, चाँदी और लोहे के — जो तभी नष्ट हो सकते थे जब एक सीध में हों, और केवल एक बाण से। जब उनकी शक्ति क्रूरता बन गई, तो देवता शिव के पास आए।
शिव पुराण बताता है कि देवताओं ने उनके लिए जो रथ बनाया, वह स्वयं ब्रह्मांड था। पृथ्वी उसका शरीर; सूर्य बारह अरों वाला दायाँ पहिया और चंद्रमा सोलह अरों वाला बायाँ; चारों वेद घोड़े और ब्रह्मा सारथी। सुमेरु पर्वत धनुष बना, नागराज प्रत्यंचा, विष्णु बाण और अग्नि उसकी धधकती नोक। शिव के रथ पर चढ़ते ही वेद-रूपी घोड़े भी उनके भार से भूमि पर गिर पड़े।
पुराण आगे कहता है कि युद्ध से ठीक पहले शिव ने देवताओं से यह स्वीकार कराया कि वे सब पशु — बंधन में पड़े जीव — हैं और वे उनके स्वामी; और वचन दिया कि जो उनका पाशुपत व्रत करेगा, वह उस बंधन से छूट जाएगा। तभी से वे पशुपति कहलाए। फिर गणेश का पूजन करने के बाद तीनों नगर एक सीध में आ गए। अभिजित् मुहूर्त में शिव ने धनुष खींचा और बाण छोड़ा, और नगर पल भर में भस्म हो गए।
शैव सिद्धांत परंपरा के आचार्य तीन नगरों को उन तीन पाशों के रूप में पढ़ते हैं जो हर आत्मा को बाँधे रखते हैं — आणव (छोटे, अलग ‘मैं’ का भाव), कर्म और माया। वे पहुँच से परे उड़ते लगते हैं, हर एक अपनी राह पर; पर जब कृपा उस क्षण को पा लेती है जब तीनों एक साथ हों, तो एक बाण तीनों का अंत कर देता है। तमिल भक्ति और आगे जाती है: शिव को बाण की आवश्यकता ही नहीं पड़ी, उन्होंने मुस्कान मात्र से नगर जला दिए।
यह विजय कार्तिक पूर्णिमा — त्रिपुरी पूर्णिमा — को याद की जाती है, जब हज़ारों दीप जलते हैं; काशी के घाट देव दीपावली पर जगमगा उठते हैं। मंदिर-कला में, विशेषकर चोल कांस्य प्रतिमाओं में, त्रिपुरांतक मानो धनुष थामे खड़े हैं — छोड़ने से ठीक पहले का क्षण: सही पल की प्रतीक्षा करने वाले धैर्य का, और फिर एक ही कर्म में पूर्ण होने वाली शक्ति का चित्र।
इस रूप की कथाएँ
कहाँ दर्शन करें
- बृहदीश्वर मंदिरतंजावुर, तमिलनाडु
गर्भगृह के चारों ओर के गलियारे के चोल भित्तिचित्रों में रथ पर त्रिपुरांतक शिव।
- वीरट्टानेश्वर मंदिर, तिरुवतिकैपनरुटी के निकट, तमिलनाडु
शिव के आठ वीर-कर्मों के अष्ट वीरट्टानम में से एक — यहाँ त्रिपुर-दहन।
स्रोत
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इस संदर्भ का मूल अंश अभी यहाँ नहीं जोड़ा गया है। ऊपर दिया स्थान और संस्करण देखें; कथा हमारे शब्दों में पुनर्कथन है।
शिव का केंद्रीय पुराण, सात संहिताओं में: विद्येश्वर, रुद्र (पाँच खंडों में), शतरुद्र, कोटिरुद्र, उमा, कैलास और वायवीय। अध्याय-संख्या संस्करणों में बदलती है; हमारे सभी संदर्भ गीताप्रेस के कल्याण शिवमहापुराणाङ्क के अनुसार हैं।
ग्रंथ-संग्रह में देखें →निश्चित
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भारत-युद्ध का महाकाव्य — और उसके चारों ओर कथाओं का सागर।
ग्रंथ-संग्रह में देखें →के. एम. गांगुली का अंग्रेज़ी अनुवाद (सार्वजनिक) ↗से
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