शिव आरती — ॐ जय शिव ओंकारा
“ॐ जय शिव ओंकारा” शिव जी की सबसे प्रसिद्ध हिन्दी आरती है। उत्तर भारत के घरों और मंदिरों में पूजा के अंत में दीप घुमाते हुए यही गाई जाती है।
इस आरती की बात ध्यान से सुनने लायक है। यह केवल शिव की स्तुति नहीं करती; पद-दर-पद ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव को साथ-साथ रखती है — हंस, गरुड़ और बैल; अक्षमाला, वनमाला और मुण्डमाला; श्वेत वस्त्र, पीताम्बर और बाघम्बर — और फिर साफ़ कहती है कि इन्हें तीन तो अविवेकी ही समझते हैं, प्रणव यानी ॐ में ये तीनों एक हैं। इसी एक प्रभु को यह “त्रिगुणस्वामी” कहती है।
अंतिम पद में “कहत शिवानन्द स्वामी” की छाप है, इसलिए परम्परा में इसके रचयिता शिवानन्द स्वामी माने जाते हैं। इस छाप के अलावा उनके जीवन या समय के बारे में हम कुछ पक्का नहीं जाँच पाए, इसलिए यहाँ कुछ नहीं कह रहे।
छपे हुए पाठों में अंतर मिलता है। छोटे पाठ में आठ पद हैं; यहाँ दिया गया बड़ा पाठ अंतिम पद से पहले चार पद और जोड़ता है (“लक्ष्मी व सावित्री”, “पर्वत सोहैं”, “जटा में” और “काशी में” से शुरू होने वाले)। अलग-अलग पुस्तकों में शब्दों का थोड़ा हेर-फेर सामान्य है, और टेक हर पद के बाद गाई जाती है।
पूरा पाठ
- 1ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥ॐ जय शिव ओंकारा॥
हे ओंकार-स्वरूप शिव, हे स्वामी, आपकी जय हो। आप ही ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव हैं, और देवी को अपने आधे अंग में धारण करते हैं।
- 2एकानन चतुरानन पंचानन राजे।हंसासन गरुड़ासन वृषवाहन साजे॥ॐ जय शिव ओंकारा॥
आप एक मुख वाले (विष्णु), चार मुख वाले (ब्रह्मा) और पाँच मुख वाले (शिव) रूप में शोभते हैं। हंस, गरुड़ और बैल आपके वाहन हैं।
- 3दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे।त्रिगुण रूप निरखते त्रिभुवन जन मोहे॥ॐ जय शिव ओंकारा॥
दो भुजाओं, चार भुजाओं और दस भुजाओं वाले आपके रूप बहुत सुन्दर लगते हैं। तीनों गुणों के इन रूपों को देखकर तीनों लोकों के लोग मोहित हो जाते हैं।
- 4अक्षमाला वनमाला मुण्डमाला धारी।त्रिपुरारी कंसारी कर माला धारी॥ॐ जय शिव ओंकारा॥
आप अक्षमाला, वनमाला और मुण्डमाला धारण करते हैं। आप ही त्रिपुर के शत्रु (शिव) और कंस के शत्रु (कृष्ण) हैं, और हाथ में माला लिए हैं।
- 5श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे।सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे॥ॐ जय शिव ओंकारा॥
आपके अंग पर श्वेत वस्त्र, पीताम्बर और बाघम्बर हैं। सनक आदि ऋषि, गरुड़ आदि और भूतगण आपके साथ रहते हैं।
- 6कर के मध्य कमण्डलु चक्र त्रिशूलधारी।सुखकारी दुखहारी जगपालन कारी॥ॐ जय शिव ओंकारा॥
आपके हाथों में कमण्डलु, चक्र और त्रिशूल हैं। आप सुख देने वाले, दुख हरने वाले और जगत का पालन करने वाले हैं।
- 7ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।प्रणवाक्षर मध्ये ये तीनों एका॥ॐ जय शिव ओंकारा॥
ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव को अलग-अलग तो अविवेकी लोग ही समझते हैं। प्रणव अक्षर ॐ के भीतर ये तीनों एक ही हैं।
- 8लक्ष्मी व सावित्री पार्वती संगा।पार्वती अर्द्धांगी, शिवलहरी गंगा॥ॐ जय शिव ओंकारा॥
लक्ष्मी, सावित्री और पार्वती आपके साथ हैं। पार्वती आपकी अर्द्धांगिनी हैं और गंगा शिव की लहर बनकर बहती हैं।
- 9पर्वत सोहैं पार्वती, शंकर कैलासा।भांग धतूर का भोजन, भस्मी में वासा॥ॐ जय शिव ओंकारा॥
पर्वत पर पार्वती शोभती हैं और शंकर कैलास पर विराजते हैं। भांग-धतूरा उनका भोजन है और भस्म में ही उनका वास है।
- 10जटा में गंग बहत है, गल मुण्डन माला।शेष नाग लिपटावत, ओढ़त मृगछाला॥ॐ जय शिव ओंकारा॥
उनकी जटाओं में गंगा बहती हैं और गले में मुण्डों की माला है। शेषनाग उनसे लिपटे रहते हैं और वे मृगछाला ओढ़ते हैं।
- 11काशी में विराजे विश्वनाथ, नन्दी ब्रह्मचारी।नित उठ दर्शन पावत, महिमा अति भारी॥ॐ जय शिव ओंकारा॥
काशी में वे विश्वनाथ रूप में विराजते हैं और ब्रह्मचारी नन्दी उनकी सेवा में हैं। भक्त रोज़ उठकर उनके दर्शन पाते हैं; उनकी महिमा बहुत बड़ी है।
- 12त्रिगुणस्वामी जी की आरति जो कोइ नर गावे।कहत शिवानन्द स्वामी, मनवांछित फल पावे॥ॐ जय शिव ओंकारा॥
शिवानन्द स्वामी कहते हैं कि जो कोई त्रिगुणस्वामी की यह आरती गाता है, वह मनचाहा फल पाता है।
पाठ कैसे और कब
यह परंपरा है, शास्त्र का विधान नहीं।
- परम्परा से यह पूजा के अंत में खड़े होकर गाई जाती है, जब शिव जी के सामने घी का दीपक या कपूर घुमाया जाता है।
- हर पद के बाद सब मिलकर टेक “ॐ जय शिव ओंकारा” दोहराते हैं, अक्सर घंटी और ताली के साथ।
- सोमवार, सावन के महीने, प्रदोष की शाम और महाशिवरात्रि पर यह विशेष रूप से गाई जाती है; कई घरों में रोज़ सुबह-शाम भी।
- आरती के बाद दीप सबके सामने लाया जाता है और लोग लौ पर हाथ फेरकर आँखों और माथे से लगाते हैं।
स्रोत
से
स्रोत खोलें
इस संदर्भ का मूल अंश अभी यहाँ नहीं जोड़ा गया है। ऊपर दिया स्थान और संस्करण देखें; कथा हमारे शब्दों में पुनर्कथन है।
1 में से 0 स्रोत अध्याय या श्लोक तक निश्चित। यह पृष्ठ अभी किसी संपादक द्वारा समीक्षित नहीं है। हम कैसे जाँचते हैं →