यक्ष और तिनका
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देवता अमृत पी चुके हैं और युद्ध जीत चुके हैं, और अब अपने ही बल की प्रशंसा करते नहीं थकते। एक अजनबी एक तिनका रखता है और उसे काटने को कहता है। भारतीय चिंतन की सबसे पुरानी कथाओं में से एक — पहली बार केन उपनिषद् में कही गई।
मंथन के बाद
जब देवताओं और असुरों ने क्षीरसागर मथा, तो सबसे पहले उसमें से प्रलयाग्नि जैसा विष निकला। दोनों पक्ष शिव की शरण में भागे, और शिव ने उसे पीकर कंठ में धारण कर लिया, और नीलकंठ कहलाए। उसकी जलन से मुक्त होकर उन्होंने फिर मंथन किया, और रत्न निकले, और अंत में अमृत। विष्णु की कृपा से केवल देवताओं ने उसे पिया — और जो अमृत बाँटा जाना था, वही युद्ध का कारण बन गया।
उस युद्ध में राहु से पीड़ित चंद्रमा “रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए” पुकारते हुए शिव के पास भागे — और शरणागत को कभी न ठुकराने वाले शिव ने चंद्रमा को अपने सिर पर धारण कर लिया। राहु पीछे-पीछे आया, पर उसने शिव को प्रणाम कर उनकी स्तुति की; और उसका मन समझकर शिव ने विष्णु द्वारा पहले काटे गए उसके सिरों को अपनी मुंडमाला में धारण कर लिया।
असुर हार गए। अमृत के बल से देवताओं ने युद्ध जीत लिया।
अहंकार का स्वर
और तब शिव की माया से मोहित होकर विष्णु और सारे देवता डींग मारने लगे। हर कोई अपने बल की प्रशंसा करने लगा। हम महाबली हैं, वे बोले। हम दैत्यों को मारने वाले हैं। वे तुच्छ दैत्य हमारे सामने कैसे टिकते?
तब गर्व चूर करने वाले शिव यक्ष का रूप धरकर वहाँ आए जहाँ देवता खड़े थे। तुम सब यहाँ क्यों इकट्ठे हो? उन्होंने पूछा। भयंकर युद्ध हुआ था, देवता बोले; असुर मारे गए, और जो बचे वे भाग गए। हम बहुत बलवान हैं। उनकी क्या बिसात थी?
सच सुनो, यक्ष ने कहा। ऐसा अहंकार मत करो। सबको रचने और मिटाने वाला तो कोई और है। तुम महादेव को भूल गए, और अपना कोई बल न होते हुए भी उसका घमंड करते हो। यदि तुम इतने बलवान हो — तो इसे काटो।
तिनका
और उन्होंने उनके सामने एक तिनका रख दिया।
एक-एक करके देवताओं ने — उनमें विष्णु भी — अपने पराक्रम पर भरोसा करके पूरी शक्ति से उस पर अपने अस्त्र चलाए। हर अस्त्र व्यर्थ हो गया। तिनका हिला तक नहीं।
तब आकाशवाणी हुई: देवताओ, यह यक्ष स्वयं सदाशिव हैं, जो सबका अहंकार हर लेते हैं। वे ही सबके कर्ता, भर्ता और संहर्ता हैं। उन्हीं के बल से सब प्राणी बलवान हैं, अन्यथा नहीं। उनकी माया और अपने अहंकार से मोहित होकर तुम अपने स्वामी को पहचान नहीं सके।
देवताओं का गर्व उतर गया। उन्होंने यक्ष को प्रणाम किया और कहा: प्रभु, आपकी माया अद्भुत है। उससे मोहित होकर हमने अपने को आपसे अलग समझा, और आपके सामने ही डींग मारी। अब आपकी कृपा से हम जान गए कि आप ही रचते, पालते और मिटाते हैं; आप ही हर शक्ति को चलाते और रोकते हैं। आपने यक्ष बनकर हमारा मद दूर किया, इसे हम आपका परम अनुग्रह मानते हैं।
यक्ष ने उन्हें बहुत-से मधुर वचनों से समझाया, और अंतर्धान हो गए।
पुरानी कथा
पुराणों से बहुत पहले केन उपनिषद् ने यह कथा कही थी। वहाँ, एक विजय के बाद जिसे देवता अपनी समझते हैं, एक रहस्यमय प्राणी — एक यक्ष — प्रकट होता है। अग्नि पता लगाने जाते हैं कि वह कौन है। यक्ष एक तिनका रखता है: इसे जलाओ। सारी पृथ्वी जला देने का दावा करने वाले अग्नि उसे झुलसा भी नहीं पाते। सब कुछ उड़ा ले जाने का दावा करने वाले वायु उसे हिला भी नहीं पाते। जब इंद्र पास जाते हैं, यक्ष अंतर्धान हो जाता है, और उसकी जगह एक दीप्तिमान स्त्री खड़ी होती हैं — उमा हैमवती, हिमालय की पुत्री — जो उनसे कहती हैं: वह ब्रह्म था। ब्रह्म की ही विजय से तुम महान् बने।
शिव पुराण उस यक्ष को स्वयं शिव मानता है, और दोनों में सीख एक ही है: संसार की हर शक्ति, देवताओं की शक्ति भी, उधार की है।
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कथा के अलग-अलग रूप
- केन उपनिषद् में यक्ष ब्रह्म है, और इंद्र को सत्य बताने वाली उमा हैमवती हैं — उस देवी के सबसे प्राचीन उल्लेखों में से एक, जो आगे चलकर पार्वती कहलाईं।
- शिव पुराण में केवल अग्नि और वायु नहीं, विष्णु सहित सारे देवताओं के अस्त्र व्यर्थ होते हैं।