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ओंकारेश्वर · परमेश्वरएक अभिमानी पर्वत, नारद की एक आह, और एक लिंग जो दो हो गया

ओंकारेश्वर: बढ़ना चाहने वाला पर्वत

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नारद से यह सुनकर कि मेरु उससे ऊँचा है और देवताओं का निवास है, आहत विन्ध्य पर्वत छह महीने तक शिव के पार्थिव लिंग की आराधना करता है। शिव उसकी इच्छा पूरी करते हैं और देवताओं के कहने पर वहीं रह जाते हैं — ओंकार का एक लिंग ओंकारेश्वर और परमेश्वर, दो रूपों में बँट जाता है।

कथा कथा — नीचे दिए ग्रंथों के आधार पर, हमारे शब्दों में

चौथा ज्योतिर्लिंग

ऋषियों ने अभी-अभी सूतजी से महाकाल की कथा सुनी थी — वह ज्योतिर्लिंग जो अपने भक्तों की रक्षा करता है। अब उन्होंने कहा — चौथे ज्योतिर्लिंग के बारे में बताइए, जो ओंकार में विराजमान है, परमेश कहलाता है और सारे पाप हर लेता है।

सूतजी ने प्रसन्न होकर कहा — सुनिए, ओंकार में परमेश नामक ज्योतिर्लिंग कैसे प्रकट हुआ।

विन्ध्य पर नारद

एक बार परम भक्त नारदजी गोकर्णेश्वर नामक शिव के पास गए और बड़े भक्तिभाव से उनकी सेवा की। वहाँ से वे विन्ध्य पर्वत पर आए, और उस महान पर्वत ने बड़े आदर से उनका सत्कार और पूजन किया।

पर विन्ध्य के इस स्वागत में अहंकार छिपा था। वह मन में सोच रहा था — “मैं हर तरह से पूर्ण हूँ, मुझमें ज़रा-सी भी कमी नहीं है।” इसी भाव से भरकर वह मुनि के सामने खड़ा हो गया।

अहंकार को चूर करना जानने वाले नारद ने यह भाँप लिया। वे कुछ बोले नहीं — बस एक लंबी साँस छोड़ी और चुप खड़े रहे।

विन्ध्य बेचैन हो उठा। “देवर्षि,” उसने कहा, “आपको मुझमें कौन-सी कमी दिखी, जो आप इस तरह आह भरकर दुखी हो रहे हैं?”

नारद ने उत्तर दिया — “तुममें सब गुण हैं, पर सुमेरु तुमसे ऊँचा है। सुमेरु पर देवता रहते हैं; तुम पर नहीं रहते।”

इतना कहकर नारद जैसे आए थे, वैसे ही चले गए।

छह महीने का तप

विन्ध्य दुख में डूब गया। उसने मन ही मन कहा — “धिक्कार है मेरे इस जीवन को। अब मैं विश्वेश्वर शिव की आराधना करते हुए तप करूँगा।” यह ठानकर वह शिव की शरण में गया।

प्रसन्न मन से वह उस स्थान पर पहुँचा जहाँ शिव ओंकारेश्वर रूप में विराजमान थे। वहाँ उसने मिट्टी से शिव की मूर्ति — एक पार्थिव लिंग — बनाई और छह महीने तक लगातार उसकी पूजा करता रहा, शिव के ध्यान में लीन, अपने तप के स्थान से तनिक भी न हिलता हुआ।

शिव प्रसन्न हुए। उन्होंने विन्ध्य को अपना वह रूप दिखाया जो योगियों को भी दुर्लभ है, और बोले — “मनचाहा वर माँगो। मैं तुम्हारे तप से प्रसन्न हूँ; मैं भक्तों की इच्छा पूरी करने वाला हूँ।”

एक वर जिसने शिव को सोच में डाला

विन्ध्य ने कहा — “हे देवेश, हे शम्भु! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो मुझे वह बुद्धि दीजिए जिसकी मुझे चाह है — जो मेरा काम सिद्ध कर दे। आप तो सदा भक्तों पर कृपा करने वाले हैं।”

यह सुनकर शिव कुछ देर सोचते रहे। पुराण कहता है कि उन्होंने देखा — यह नासमझ विन्ध्य ऐसा वर माँग रहा है जो दूसरों को कष्ट देगा। वे सोचने लगे — ऐसा क्या करूँ कि मेरे वर से इसका भला भी हो, और मेरा दिया हुआ वर किसी दूसरे को पीड़ा भी न दे?

फिर भी उन्होंने वर दे दिया। “हे पर्वतराज,” वे बोले, “जैसा चाहो, वैसा करो।”

एक लिंग, दो रूप

उसी समय देवता और निर्मल मन वाले ऋषि वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने शिव की पूजा की और कहा — “प्रभो, आप यहीं निवास कीजिए।”

यह सुनकर शिव बहुत प्रसन्न हुए और लोककल्याण के लिए प्रेम से वैसा ही किया।

ओंकार नाम का जो एक लिंग था, वह दो रूपों में बँट गया। प्रणव — पवित्र अक्षर ॐ — में स्थित सदाशिव ओंकारेश्वर नाम से प्रसिद्ध हुए, और विन्ध्य के बनाए पार्थिव लिंग में जो प्रकट हुए, वे परमेश्वर कहलाए। पुराण कहता है कि दोनों ही भक्तों की मनोकामना पूरी करते हैं, और दोनों ही इस लोक में भोग और परलोक में मुक्ति देते हैं।

देवताओं और ऋषियों ने उनकी पूजा की, वृषभध्वज शिव को प्रसन्न किया और अनेक वर पाए। फिर देवता अपने-अपने लोक लौट गए। विन्ध्य भी बहुत आनंदित हुआ — उसका काम सिद्ध हो गया था, और उसने अपना दुख त्याग दिया।

फल

सूतजी ने कहा — जो इस प्रकार शिव की पूजा करता है, वह फिर माता के गर्भ में वास नहीं करता, और जो भी फल चाहता है, उसे पा लेता है — इसमें कोई संदेह नहीं।

इस तरह सूतजी ने ओंकारेश्वर का माहात्म्य पूरा किया और आगे केदारेश्वर की कथा की ओर बढ़े।

॥ इति ॥

कथा पूर्ण

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विचार

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यह कथा कहाँ वर्णित है

अध्याय
निश्चित
शिव पुराण
कोटिरुद्र संहिता, अध्याय 18 (ऋषियों का प्रश्न: 18.1–3; विन्ध्य पर नारद और उनकी आह: 18.4–9; विन्ध्य का संकल्प: 18.10–11; छह महीने पार्थिव लिंग की पूजा: 18.12–13; शिव का प्राकट्य और वरदान: 18.14–19; देवताओं की विनती: 18.20–21; एक लिंग का ओंकारेश्वर और परमेश्वर में विभाजन: 18.22–23; वरदान और विदाई: 18.24–25; फलश्रुति: 18.26)
क्रमांकन: गीताप्रेस, गोरखपुर — कल्याण श्रीशिवमहापुराणाङ्क (श्लोकाङ्क सहित हिन्दी अनुवाद)
शोध
जारी
महाभारत
वन पर्व — अगस्त्य और विन्ध्य की कथा
मेरु से विन्ध्य की होड़ की एक अलग कथा; अध्याय-संख्या अभी निश्चित करनी है।

2 में से 1 स्रोत अध्याय या श्लोक तक निश्चित; 1 पर शोध जारी। यह पृष्ठ अभी किसी संपादक द्वारा समीक्षित नहीं है। हम कैसे जाँचते हैं →

कथा के अलग-अलग रूप

  • शिव पुराण यह नहीं बताता कि विन्ध्य ने अपने वर का क्या किया — केवल इतना कि शिव को डर था कि इससे दूसरों को कष्ट होगा, और पर्वत संतुष्ट होकर चला गया। महाभारत मेरु से विन्ध्य की ईर्ष्या की एक अलग कथा कहता है: वह इतना ऊँचा बढ़ने लगा कि सूर्य का मार्ग रुक गया, तब अगस्त्य मुनि ने उससे झुककर दक्षिण जाने का रास्ता देने और उनके लौटने तक वैसे ही रहने को कहा — और वे कभी लौटे नहीं।
  • इस अध्याय के दोनों लिंग आज नर्मदा के दोनों ओर पूजे जाते हैं: ओंकारेश्वर मान्धाता द्वीप पर, और दूसरा मंदिर — अमलेश्वर या ममलेश्वर — दक्षिणी तट पर। गीताप्रेस का अनुवाद पुराण के “परमेश” को अमरेश्वर कहकर समझाता है।
  • लोक परंपरा इस द्वीप को राजा मान्धाता से जोड़ती है, जिन्होंने यहाँ तप किया बताया जाता है; वह कथा शिव पुराण के इस अध्याय में नहीं है।