महानंदा और रत्न-कंकण
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वह एक गणिका थी, और शिव की भक्त — उसके नाचने वाले बंदर और मुर्गे रुद्राक्ष पहनते थे। एक वैश्य एक वचन के बदले उसे कंकण देता है। शिव पुराण बताता है कि जब उस वचन को निभाने का अर्थ अग्नि में जाना हुआ, तो उसने क्या किया।
नंदिग्राम की नर्तकी
नंदिग्राम में महानंदा नाम की एक गणिका रहती थी — धनी, कांतिमान, रत्नों से सजी, संगीत की हर कला में निपुण। राजा-रानियाँ उसके गायन से प्रसन्न होते थे। और वह शिव की भक्त थी। वह रोज़ शिव-पार्वती की पूजा करती, शिव-नाम जपती, भस्म और रुद्राक्ष धारण करती, और उनका यश गाती हुई उनके सामने नाचती थी।
उसके पास एक बंदर और एक मुर्गा था, और वह दोनों को रुद्राक्षों से सजाती थी। वह ताली बजाकर गाती, तो बाँहों और कानों में रुद्राक्ष पहने बंदर बालक की तरह नाचता, और कलगी में रुद्राक्ष पहने मुर्गा उसके साथ नाचता। उन्हें देखकर महानंदा और उसकी सखियाँ खिलखिलाकर हँसतीं। इस तरह वह बहुत समय तक सुख से रही।
वैश्य
एक दिन उसका मन परखने स्वयं शिव व्रतधारी वैश्य के रूप में उसके घर आए: माथे पर त्रिपुंड, रुद्राक्ष के आभूषण, जटाएँ, होठों पर सदा शिव-नाम — और कलाई में उत्तम रत्नों से जड़ा एक कंकण।
महानंदा ने आदर से उनका सत्कार किया। फिर उसकी नज़र उस कंकण पर पड़ी। इस कंकण ने मेरा मन मोह लिया है, उसने कहा। यह तो दिव्य स्त्रियों के योग्य है।
वैश्य मुस्कुराए। यदि मन इस पर आ गया है, तो तुम ही पहनो। पर इसका मूल्य क्या दोगी?
उसने अपनी दुनिया के अनुसार सीधा उत्तर दिया: हम गणिकाएँ हैं, पतिव्रताएँ नहीं; यही हमारे कुल का धर्म है। यह कंकण मेरे मन को भा गया है, इसलिए मैं तीन दिन-रात आपकी पत्नी बनकर रहूँगी।
ठीक है, वैश्य बोले। यदि तुम्हारा वचन सत्य है, तो कंकण तुम्हारा, और तीन रात तुम मेरी पत्नी। सूर्य और चंद्रमा साक्षी हैं। तीन बार कहो कि यह सत्य है, और मेरे हृदय को छुओ।
मैं तीन दिन-रात आपकी पत्नी बनकर पत्नी-धर्म निभाऊँगी, उसने कहा। यह सत्य है, सत्य है। और उसने उनके हृदय को छुआ। उन्होंने उसे कंकण दे दिया — और फिर उसके हाथों में रत्नों से बना एक शिवलिंग रखा। यह लिंग मुझे प्राणों से भी प्रिय है, उन्होंने कहा। इसकी रक्षा करना, इसे छिपाकर रखना। उसने उसे अपनी नाट्यशाला के बीच रखा और भीतर चली गई।
नाट्यशाला में आग
आधी रात को, वैश्य की इच्छा से, नाट्यशाला में एक ध्वनि उठी। आग भड़की और तेज़ हवा के साथ पूरी शाला को लपटों ने घेर लिया। महानंदा ने दौड़कर बंदर को खोल दिया; वह मुर्गे के साथ चिंगारियों के बीच से भाग निकला। पर खंभे के पास रखा रत्न-लिंग जलकर टूट गया।
वैश्य ने यह देखा और शोक में डूब गए। प्राणों से प्रिय लिंग के नष्ट हो जाने पर मैं जीना नहीं चाहता, उन्होंने कहा। चिता बनवाओ। मैं शिव में मन लगाकर अग्नि में प्रवेश करूँगा — ब्रह्मा, इंद्र या स्वयं विष्णु भी मुझे नहीं रोक सकते। दुखी मन से उसने घर के बाहर चिता बनवाई। उन्होंने अग्नि की परिक्रमा की, और सबके देखते-देखते उसमें प्रवेश कर गए।
सत्य
महानंदा स्तब्ध खड़ी रही। फिर उसने अपने बंधुओं से कहा: मैंने यह कंकण लेकर वचन दिया था कि तीन दिन इस पुरुष की धर्म-पत्नी रहूँगी। मेरे घर में हुई घटना से यह शिव-व्रती मारा गया। मैं इसके साथ अग्नि में प्रवेश करूँगी। सत्य ही परम धर्म है। सत्य से ही स्वर्ग और मोक्ष मिलते हैं। सब कुछ सत्य पर टिका है।
बंधुओं ने उसे रोकने की विनती की। उसने अपना वचन नहीं तोड़ा। उसने अपनी संपत्ति ब्राह्मणों को दान कर दी, सदाशिव का ध्यान किया, अग्नि की तीन परिक्रमाएँ कीं, और उसमें प्रवेश करने बढ़ी।
जिसकी परीक्षा हुई
स्वयं शिव ने उसे थाम लिया — त्रिनेत्र, जटाओं में चंद्रकला, करोड़ों सूर्य-चंद्र-अग्नि जैसे दीप्त। वह काँपती, रोती, जड़-सी खड़ी रह गई। उन्होंने उसके हाथ पकड़कर उसे ढाढ़स दिया:
तुम्हारे सत्य, धर्म, धैर्य और भक्ति की परीक्षा के लिए मैं वैश्य बनकर आया था। मेरी माया ने ही आग लगाई और लिंग जलाया, और मैं ही अग्नि में गया था। तुमने अपना वचन निभाया और मेरे पीछे अग्नि में आने लगीं। कुछ भी माँगो। तुम्हारे लिए कुछ भी अदेय नहीं।
महानंदा बोली: मुझे पृथ्वी, स्वर्ग या पाताल के भोग नहीं चाहिए। मुझे केवल आपके चरण-कमलों का स्पर्श चाहिए। और मेरे सेवक, मेरी दासियाँ, मेरे बंधु — सब आपके दर्शन के लिए लालायित हैं। मेरे साथ इन सबको अपने परम धाम ले चलिए, और हमें फिर जन्म लेने के भय से छुड़ाइए।
और शिव ने ऐसा ही किया। वे महानंदा और उसके सारे परिवार को अपने परम पद ले गए।
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कथा के अलग-अलग रूप
- स्कंद पुराण भी रुद्राक्ष-धारण की महिमा के प्रसंग में इस कथा का एक रूप कहता है: शिव के लिए नाचते समय रुद्राक्ष पहनने वाले वे बंदर और मुर्गा अगले जन्मों में राजकुमार बनते हैं।
- यह पुराणों की उन कई कथाओं में से एक है जहाँ शिव का भक्त प्रतिष्ठित समाज से बाहर का है — एक भील, एक गणिका, एक चोर — और उसकी परीक्षा पद पर नहीं, सत्य और प्रेम पर होती है।